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लोकतंत्र सजग नागरिक और सशक्त मतदाता से ही परवान चढ़ता है, संदर्भ- विधानसभा चुनाव

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Faisal Anurag

सौदेबाजी की राजनीतिक प्रवृति ने न केवल लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल पैदा कर दिये हैं, बल्कि सत्ता की भूख के कारण अनैतिक तालमेल और पार्टी चयन के कारण राजनीतिक साख भी संकटग्रसत है. इस लिहाज से भारत की राजनीति का यह दौर बेहद संजीदा है.

JMM

लोकतंत्र में भागीदारी और प्रतिनिधित्व की बढ़ती भूख भी सत्तालोलुपता का एक खतरनाक रूपक बनाती है. खास तौर पर दलबलुओं की राजनीतिक अैर मतदाताओं की स्वीकृति की बढती प्रवृति ने राजनीतिक विचारों को भी प्रदूषित कर दिया है. ज्यादातर संसदीय दलों में किसी भी तरह का भेद नहीं हाने की स्थिति विकल्प की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है.

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आर्थिक नीतियों के सवाल पर राजनीतिक दलों में किसी तरह का खास अलग रुख का नहीं होना भी बताता है  कि वोट और मतदाताओं के सशकत होने की संभावना भी धूमिल हो रही है. लोकतंत्र सजग नागरिक और  सशक्त मतदाता से ही परवान चढ़ता है.

भारत के मतदाताओं की भागीदारी तो बढ़ रही है, लेकिन वे नागरिक के बतौर अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से अक्सर परहेज करते दिखते हैं. संवैधानिक हक का अर्थ है नागरिक के बतौर मतदाताओं का राजनीतिककरण. ऐसे नागरिक सिद्धांतों के चयन के चयन को प्रथमिकता देते हैं न कि वोट का सौदा करने वाले समूह के तौर पर.

भारत में यदि अब भी विभिन्न सामाजिक धार्मिक समीकरण का सामंती वर्चस्व बना हुआ है. यह अंबेडकरवादी अवधारणा के विपरीत है. संविधान निर्माताओं ने वोटरों के चयन की कसौटी को गंभीरता से ध्यान में रखा था. इसलिए संविधान बनने के दौर में वैज्ञानिक नजरिये और चिंतन पर जोर दिया गया था.

महाराष्ट्र में राजनीतिक सौदेबाजी का सीन दिखाई दे रहा है, उससे भी गठबंधन राजनीति और बहुमत की राजनीति बेपरदा हो जाती है. हरियाण में तो जिस तरह से दुष्यंत चैटाला ने पिता के नाम पर सौदेबाजी की है वह बेहद खतरनाक है.

वोटरों के बहुमत नहीं दिये जाने के बाद भी जिस तरह सत्ता हासिल करने के लिए गठजोड़ बनाये जाते हैं और पार्टियां व विधायकों की खुली खरीद फरोख्त हो रही है, वह झारखंड जैसे छोटे राज्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है.

राज्य बनने के बाद से अब तक झारखंड में विधायकों की खरीद फरोख्त में जिस तरह कुछ नेताओं ने हिस्सेदारी निभायी है, उससे जाहिर होता है कि झारखंड निर्माण का कोई भी सपना इनके पास नहीं है. यहां तक कि बड़े राजनीतिक दलों के पास भी एक नये राज्य को उसकी सांस्कृतिक चेतना के हिसाब से गढ़ने का न तो कोई विचार है और न ही कोई इरादा.

2000 के बाद से ही देख गया है कि कार्रपोरेट हितों के लिए झारखंड के राजनीक दलों ने किस तरह का समझौता किया है. और झारखंड के लोगों के इरादों के साथ खिलवाड़ किया है. झारखंड आंदोलन के पीछे जो सपने और इरादे थे, वे इन्हीं कारणों से असमय मौत के शिकार हुए हैं.

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2019 में, जब झारखंड एक बार फिर चुनाव के मैदान में है, यह सवाल चर्चा के दायरे से ही बाहर है कि आखिर इस चुनाव का एजेंडा क्या है. राजनीतिक दल वोटरों के पास किस तरह का एजेंडा रख रहे हैं. इस तरह का एजेंडारहित चुनाव बेहद खतरनाक भविष्य का ही संकेत है.

झारखंड में विकास के नाम पर जिस तरह की नीतियां अपनायी गयी हैं, उसके बहुत सार्थक परिणाम देखने को नहीं मिले है. आम आवाम में असंतोष तो है लेकिन उसकी कोई राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं दिखती है. इससे जाहिर होता है कि अवाम तो एक वोटर के तौर पर अपनी भूमिका निभाना चाहता है. लेकिन उसके पास राजनीतिक दलों का कोई वैकल्पिक एजेंडा नहीं है.  जो उसे नागरिक के तौर पर चयन के लिए प्रेरित कर सके.

यही कारण है कि गठबंधनों के पास राजनीतिक समूहों को विचार के आधार पर समेटने की रुचि नहीं हैं. सत्ता के लिए जरूर गठबंधन बन रहे हैं लेकिन आर्थिक प्रगति के लिए उनके पास नीतियों का सतत अभाव है. इस कारण ही दलबदल को सार्वजिनक तौर पर मान्यता देने का साहस बढ़ता ही जा रहा है.

आज यह किसी भी नेता के संदर्भ में कहना मुश्किल है कि टिकट नहीं मिलने की स्थिति में वह अपने दल के साथ ही बंधा ही रहेगा. या पार्टी प्रत्याशी को वह खुल कर मदद करेगा. इस राजनीतिक शून्यता के कारणों की पहचान अनिवार्य है. झारखंड में तो यह भी देखा जा रहा है कि राजनीतिक विकल्पों की बात करने वाले भी राजनीतिक सौदेबाजी के हिस्सेदार बनने की होड़ से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

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