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  क्या महिलाओं को लोकतंत्र में हिस्सेदारी के लिए हर बार पड़ेगी किसी मेंटॉर की जरूरत?

महिलाओं की बात जब भी आती है, उसे आधी आबादी से जोड़ कर हिस्सेदारी देने की वकालत होती है. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? होता भी होगा तो राजनीति के अलावा दूसरे क्षेत्रों में होता होगा.

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Ranchi : महिलाओं की बात जब भी आती है, उसे आधी आबादी से जोड़ कर हिस्सेदारी देने की वकालत होती है. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? होता भी होगा तो राजनीति के अलावा दूसरे क्षेत्रों में होता होगा. लेकिन राजनीति में अब यह सच होता जा रहा है कि अगर लोकतंत्र में महिलाओं को हिस्सेदारी चाहिए तो, उन्हें एक बड़े घराने से जुड़ा हुआ होना जरूरी है. झारखंड के लोकसभा चुनाव के नतीजे तो कम से कम यही कह रहे हैं. इस बार झारखंड से दो महिलाओं ने बाजी मारी है.

लेकिन जरूरत इस बात को जानने की है कि यह दोनों महिलाएं हैं कौन. क्या ये दोनों कोई साधारण महिलाएं हैं. जो घर का चूल्हा चौकी करते हुए राजनीतिक झंझावतों को झेलते हुए इस मुकाम पर पहुंची है. जवाब है बिलकुल नहीं. दोनों ही महिलाओं का पारिवारिक बैकग्राउंड राजनीति से संबधित है. और दोनों की ही अपने अपने क्षेत्र में पकड़ है. ऐसे में जिस भी बड़ी पार्टी ने इन महिलाओं को टिकट दिया, उनकी पहचान और पकड़ के बल पर ही दिया. जबकि सामान्य महिलाओं को पहचान होते हुए भी मुंह की खानी पड़ी.

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जानिए कौन हैं अन्नपूर्णा देवी

अन्नपूर्णा देवी कोडरमा सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के पूर्व कई बार कोडरमा सीट से विधायक रह चुकी हैं. उनके पति रमेश प्रसाद यादव एकीकृत बिहार के वक्त मंत्री पद पर रह चुके हैं. रमेश प्रसाद यादव का देहांत (1998) होने के बाद  अन्नपूर्णा ने राजनीति में कदम रखा. जिसके बाद 2000 और 2005 के चुनाव में लगातार कोडरमा विधानसभा सीट से विजयी हुई. 2000 में बिहार में राबड़ी देवी की सरकार के समय अन्नपूर्णा मंत्री पद पर भी रहीं. शिबू सोरेन के नेतृत्व में ये राज्य कैबिनेट में भी शामिल हुई. 2019 के चुनाव में अन्नपूर्णा देवी ने राजद से इस्तीफा दिया और भाजपा में शामिल हुई. जिसके बाद इन्हें कोडरमा से टिकट मिला और विजयी हुई.

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जानिए कौन हैं गीता कोड़ा

गीता कोड़ा लोकसभा चुनाव जीतने के पहले जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रही है. इनके पति मधु कोड़ा कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे है. जो 2006 से 2008 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे. मधु कोड़ा ने छात्र नेता के रूप में कैरियर की शुरूआत की. बाबूलाल मरांडी की सरकार के समय कोड़ा जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से विधायक हुए. कोयला आवंटन घोटाला में मधु कोड़ा को जेल होने के बाद गीता कोड़ा में राजनीति में कदम रखा. जय भारत समानता पार्टी से 2009 में विधायक बनीं. 2014 में भी इसी पार्टी से जीत कर जगन्नाथपुर से बनीं रही. वहीं 2018 में संसद की ओर से इन्हें कामनवेल्थ वीमेंस संसद के लिए नामित किया गया. यहां उन्हें स्टेयरिंग कमेटी के सदस्य के रूप में नामित किया गया. 2019 में सिंहभूम से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत गयीं.

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पहचान होते हुए भी सामान्य महिलाएं नहीं बना पायी जगह

यहां स्पष्ट है कि ऐसी महिलाएं जो अपनी पहचान समाज के बीच रखती हैं, फिर भी उन्हें सही वोट तक नहीं मिले. इनमें खूंटी से प्रत्याशी मीनाक्षी मुंडा को 10, 989 वोट मिले. जो कुल मतदान का 1.32 प्रतिशत रहा. हालांकि आदिवासियों के बीच इनकी एक अलग ही पहचान है. एशिया पेसिफिक इंडिजेनियस यूथ नेटवर्क की ये एशिया लेवल प्रसिडेंट भी हो. जो अंर्तराष्ट्रीय पटल है. इसके बावजूद इन्हें चुनाव में जनता का साथ नहीं मिला. अन्य निर्दलीय लड़ी महिलाओं में धनबाद से लक्ष्मी देवी 10,876, दुमका से प्रोबिना मुर्मू 16,157, गिरीडीह से सिम्मी सुमन ने 4173, सुनीता टूड्डू ने 9077, जमशेदपुर से निर्दलीय सरिता आंनद को 1191, लोहरदगा से सानिया उरांव ने 5263, पुष्पा सिंकु को 15,224 वोट मिले.

प्रमुख दल को छोड़ अन्य किसी पार्टी की महिला नहीं लायी अधिक वोट

भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय को छोड़ कर अन्य पार्टियों की ओर से भी महिला प्रत्याशी थी. लेकिन इन महिला प्रत्याशियों को भी जनता ने कम ही आंका. जिसमें धनबाद से माधवी सिंह जो एआइटीसी से है इन्हें 8235 वोट मिलें, दुमका सीपीआई उम्मीदवार सेनापति मुर्मू को 16,157, गोड्डा से आशा पीएसपीयू को 6580, जेपीजेडी हजारीबाग से रजनी देवी को 2137 वोट मिले. एसयूसीआइ पार्टी की जमशेदपुर से पानमणी सिंह को अंतिम चरण तक 2471, एएचएनपी की सबिता कैवर्त को 6272, खूंटी से बीएसपी की इंदूमति मुंडा को 7663 वोट मिलें. कोडरमा से एआइटीसी की कंचन कुमारी को 14,119, पलामू से सीपीआइएमएल की सुषमा मेहता को 5004, राजमहल से बीएमयूपी की मेरी निशा हंसदा को 2948 और एआइटीसी की मोनिका किस्को 17,427, रांची से एपीओआइ की सुनीता मुंडा को 6669 वोट मिले.

33 प्रतिशत आरक्षण 2008 से लंबित

चुनाव में महिलाओं की ऐसी स्थिति से लगता है संसदीय चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को देना उचित होगा. जिसकी मांग समय समय पर सामाजिक संगठनों ने की. राज्य में भी चुनाव में पहले महिला आरक्षण और महिला वोटरों पर कई कार्यक्रम आयोजित किये. जिसमें कई शीर्ष नेतागण भी शामिल हुए. लेकिन फिर भी पार्टियों की नीति में इस मामले में बदलाव नहीं पाये गये. संसद में साल 2008 से संसदीय चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग लंबित है.

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