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सीएम रघुवर दास समेत पांच पूर्व सीएम का चुनाव में होगा लिटमस टेस्ट, दांव पर है प्रतिष्ठा

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  • तीन पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी ,शिबू सोरेन और अर्जुन मुंडा संसद पहुंचने की जुगत में
  • पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी व हेमंत सोरेन के समक्ष संगठन का अस्तित्व बचाने की चुनौती

Ravi/Pravin

Ranchi: लोकसभा का चुनाव झारखंड के कद्दावर नेताओं के लिये कई मायनों में ऐतिहासिक होगा. खासकर सीएम रघुवर दास सहित पांच पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी, शिबू सोरेन,मधु कोड़ा, अर्जुन मुंडा और हेमंत सोरेन का चुनाव में लिटमस टेस्ट होगा.

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पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी और हेमंत सोरेन के समक्ष संगठन के अस्तित्व को बचाने की चुनौती है. सीएम रघुवर दास के लिए भी अग्निपरीक्षा है. लोकसभा का चुनाव परिणाम यह तय कर देगा कि विधानसभा चुनाव में रघुवर दास भाजपा के लिए सीएम पद का चेहरा होंगे या नहीं.

झारखंड की 14 लोकसभा सीटों पर होनेवाला चुनाव भले ही कोई और दिशा तय करे या नहीं करे, लेकिन इन छह बड़े राजनीतिक चेहरों का भविष्य जरूर तय करेगा. ये भी सच है कि इन कद्दावर नेताओं में जो बाजी मारेगा वही सिकंदर कहलायेगा.

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हेमंत की राजनीतिक समझदारी की होगी परीक्षा

झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन की राजनीतिक समझदारी की परीक्षा होगी. साथ ही संगठन के अस्त्वि को बचाने की चुनौती भी. हालांकि हेमंत सोरेन खुद चुनावी मैदान में नहीं हैं, फिर भी झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी भी उन्हीं के कंधों पर है.

कुल एक साल पांच महीने और 15 दिन तक झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले हेमंत सोरेन झारखंड की राजनीति का युवा चेहरा हैं. अगामी विधानसभा चुनाव भी हेमंत सोरेन के नेतृत्व में ही लड़ा जाना है.

लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन को अंतिम रूप देते समय भी हेमंत ने कांग्रेस के सामने अपनी शर्तें पूरी मजबूती से रखीं और इसमें वे सफल भी रहे. विपक्ष की चुनावी रणनीति का आधा दारोमदार उनके कंधों पर ही है.

लोकसभा चुनाव में भी हेमंत सोरेन पर कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने और वोटरों के बीच अपनी पैठ बनाने की बड़ी चुनौती होगी.

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लोकसभा चुनाव तय करेगा बाबूलाल का राजनीतिक भविष्य

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी दो साल चार महीने दो दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे. बीजेपी से मोह भंग होने के बाद नयी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा बनाई. इस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे.

पिछली बार दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गये. विधानसभा चुनाव में भी जीत नहीं मिली. उनकी पार्टी के आठ विधायक जीते, लेकिन बाद में छह बीजेपी में चले गये.

इस बार बाबूलाल खुद कोडरमा सीट से ताल ठोंक रहे हैं. यह चुनाव उनका राजनीतिक भविष्य भी तय करेगा. साथ ही उनके समक्ष संगठन के अस्तित्व को बचाने की भी चुनौती होगी. हालांकि मुख्यमंत्री बनने से पहले वे केंद्रीय मंत्री भी रहे.

सीएम बनने के बाद से कोडरमा से वह दो बार सांसद चुने गये, लेकिन उसके बाद वह दुमका चले गये, जिसका खामियाजा उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा. पिछले चुनाव के बाद से ही वह लगातार सक्रिय रहे हैं और जनता के मुद्दों को पूरी शिद्दत से उठाते रहे हैं.

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मधु कोड़ा के सामने दाग धोने की चुनौती

निर्दलीय मुख्यमंत्री के रूप में पूरे देश में चर्चित मधु कोड़ा के लिए यह चुनाव राजनीति के मैदान में उनकी प्रासंगिकता तय करेगा. कुल एक साल 11 महीने और नौ दिन तक मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालनेवाले मधु कोड़ा का राजनीतिक सफर बीजेपी से शुरू हुआ. इस समय वह कांग्रेस के साथ हैं.

भ्रष्टाचार के कई आरोपों से घिरे होने के कारण उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी है. लेकिन इस चुनाव में उनकी पत्नी गीता कोड़ा चाईबासा से कांग्रेस की प्रत्याशी हो सकती हैं. चाईबासा, खासकर जगन्नाथपुर के इलाके में मधु कोड़ा की अपनी राजनीतिक पहचान है. चुनाव में यदि गीता कोड़ा जीत हासिल करती हैं तो मधु कोड़ा के लिए संजीवनी साबित होगा.

यदि गीता कोड़ा चुनाव जीतती हैं, तो मधु कोड़ा के लिए घोटालों का दाग कुछ हद तक जनता की नजर में कम करने में मदद मिलेगी. इस लिहाज से यह चुनाव मधु कोड़ा के लिए जीवन-मरण का सवाल बन कर सामने है, जिसे जीतने के लिए उन्हें अपना सब कुछ झोंकना होगा.

अर्जुन मुंडा के सामने कड़िया की विरासत को सहेजने की चुनौती

पांच साल नौ महीने और 26 दिन तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठनेवाले अर्जुन मुंडा इस चुनाव में खूंटी से बीजेपी के उम्मीदवार हैं. उनके सामने सांसद कड़िया मुंडा की विरासत को सहेजे रखने की चुनौती है.

साथ ही उन्हें पत्थलगड़ी समर्थकों और ईसाई मिशनरियों की चुनौती से निपटना होगा. अगर अर्जुन मुंडा खूंटी का किला फतह करने में सफल होते हैं तो राजनीति में उनकी वापसी होगी. उनका मुकाबला कांग्रेस से होना है.

झामुमो से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करनेवाले अर्जुन मुंडा एक बार जमशेदपुर के सांसद भी रहे. इस बार बीजेपी ने झारखंड में अपने सबसे मजबूत गढ़ खूंटी को उनके हवाले किया है. इस चुनाव में उनका पूरा राजनीतिक करियर दांव पर लगा है.

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हालांकि अर्जुन मुंडा ने कड़िया मुंडा का समर्थन तो हासिल कर लिया है, लेकिन अब खूंटी के मतदाताओं को उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि वह राजनीति भी अपने तरीके से करते हैं.

शिबू सोरेन की प्रतिष्ठा दांव पर

झारखंड मुक्ति मोर्चा को शून्य से शिखर पर लाने और संताल परगना में पार्टी के गढ़ को लगातार बचाये रखनेवाले शिबू सोरेन का सीधा सामना बीजेपी से होगा. बीजेपी के उम्मीदवार सुनील सोरेन तीसरी बार दुमका में शिबू सोरेन के सामने होंगे.

चुनाव का परिणाम चाहे कुछ भी हो, शिबू सोरेन और झामुमो के लिए दुमका का रण इस बार निर्णायक साबित होगा. शिबू सोरेन कुल तीन बार में 10 महीने और तीन दिन झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं. मुख्यमंत्री का पद संभालने के बावजूद शिबू सोरेन आज तक विधायक नहीं बन सके हैं. वह हमेशा सांसद ही रहे.

मुख्यमंत्री के रूप में शिबू सोरेन के तीन कार्यकाल में सबसे छोटा 10 दिन का रहा. बढ़ती उम्र और लगातार खराब होती सेहत शायद उन्हें अगला चुनाव लड़ने की इजाजत न दे.

रघुवर के सामने भाजपा के रिकॉर्ड को बचाये रखने की चुनौती

सीएम रघुवर दास के लिए भी यह चुनाव एक अग्निपरीक्षा है. लोकसभा का चुनाव परिणाम यह तय कर देगा कि विधानसभा चुनाव में रघुवर दास भाजपा के लिए सीएम पद का चेहरा होंगे या नहीं.

पिछले चुनाव में भाजपा ने राज्य में 47 लाख से अधिक मत हासिल किये थे और अब पांच साल बाद पार्टी अपना वह प्रदर्शन यदि दोहरा पायेगी, तो यह रघुवर दास के लिए टॉनिक का काम करेगी. उनकी राजनीतिक हैसियत बढ़ेगी.

इस चुनाव में टिकट तय करने से लेकर रणनीति को अंतिम रूप देने तक में रघुवर दास ने अहम भूमिका निभायी है. यदि जीत हासिल हुई, तो पार्टी के अंदर उनके विरोधियों की आवाज दब जायेगी, लेकिन यदि प्रदर्शन खराब रहा, तो रघुवर के सामने कई समस्याएं खड़ी हो जायेंगी.

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