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राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था भगवान भरोसे : योगेंद्र प्रताप

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Ranchi : झाविमो के केंद्रीय प्रवक्ता योगेंद्र प्रताप ने कहा है कि पूरे झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है. राजधानी रांची स्थित रिम्स में कुव्यवस्था की कहानी तो आये दिन सामने आती ही रहती है, वहीं पूरे राज्य के जिला व अनुमंडल मुख्यालय स्थित सरकारी अस्पतालों को भी खुद उपचार की जरूरत है. सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केंद्र व उपकेंद्र की स्थिति की तो बात ही छोड़िये. एक तरफ केंद्रीय स्वास्थ्य महकमा अपनी पीठ खुद थपथपा रहा है कि आयुष्मान भारत के तहत देश में हर 12 सेकंड में एक गरीब का नि:शुल्क इलाज हो रहा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड के उनके ही विधायक बजट सत्र में इस योजना को नाम बड़ा और दर्शन छोटा बताते दिखे. झारखंड में स्वास्थ्य महकमे की जमीनी हकीकत काफी भयावह है. लोगों को प्राथमिक उपचार तक मयस्सर नहीं है. साथ ही दवा सहित तमाम मौलिक सुविधाओं का घोर अभाव है.

चिकित्सकों की है कमी

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योगेंद्र प्रताप ने कहा कि डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार प्रति 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, परंतु झारखंड में लगभग 20,000 की आबादी पर एक डॉक्टर उपलब्ध हैं. ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था का आलम बखूबी समझा जा सकता है. बताया जाता है कि केवल राजधानी में 1500 डॉक्टर की जरूरत है, परंतु शर्मनाक पहलू यह है कि पूरे राज्य में कार्यरत डॉक्टरों की संख्या ही केवल रांची की जरूरत से कुछ अधिक है. झारखंड में वर्तमान आबादी के अनुसार 32,500 सामान्य व विशेषज्ञ चिकित्सकों की जरूरत है. वहीं, 3960 स्वीकृत पद हैं, परंतु राज्य में लगभग 1700 चिकित्सक ही कार्यरत हैं. राजधानी में कुव्यवस्था का आलम इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले वर्ष रिम्स में आठ माह में 709 बच्चों की मौत हो गयी थी. हकीकत यह है कि ग्रामीण तो दूर, शहरी क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में ससमय डॉक्टर आते तक नहीं हैं और सरकार उन्हें दायित्व बोध कराने या मनमानी पर लगाम कसने में असफल साबित हो रही है. सूबे के स्वास्थ्य मंत्री अपने विभाग में कम, शिक्षा विभाग में ज्यादा रुचि दिखाते नजर आते हैं. अपने गृहनगर स्थित एमजीएम अस्पताल की बदहाली को मिटाने में मुख्यमंत्री नाकाम साबित हुए हैं. नीति आयोग ने कई दफा राज्य की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था पर चिंता जाहिर की परंतु राज्य या केंद्र सरकार ने कभी संजीदगी नहीं दिखायी.

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