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घर का खपड़ा बेचकर 1000 रुपये घूस दिया, फिर भी नहीं बना राशन कार्ड

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  • उम्र के आखिरी पड़ाव में 75 साल के सुरजन घासी को नहीं मिल रहा राशन-पेंशन
  • सूबे में गरीबी और भुखमरी के दिल दहला देनेवाले कई उदाहरण आ चुके हैं सामने

Pravin Kumar

Ranchi/Latehar : सबका साथ सबका विकास है केंद्र से लेकर राज्य तक का नारा. शहरों में बड़े-बडे होर्डिंग और पोस्टर भी. इसमें झलक खुशहाली की. लेकिन, झारखंड में स्थिति ठीक इसके उलट है. साथ भी नहीं, विकास भी नहीं. शहरों की चकाचौंध से बाहर गरीबी और भुखमरी. प्रदेश में कथित तौर पर भूख से अब तक 19 लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं. भले ही सरकार इसमें तर्क-वितर्क करे, लेकिन सच्चाई यही है कि इन्हें सरकार का साथ (योजनाओं का लाभ) नहीं मिला. पिछले चार सालों में कथित भुखमरी की कई घटनाएं हो चुकी हैं. शहर से लेकर गांव तक में इसकी चर्चा है. ये घटनाएं अखबारों की सुर्खियां भी बनीं. फिर भी सरकार कह रही है सबका साथ-सबका विकास.

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फिर चूर-चूर हुई मामनवीय संवेदना

हम बात कर रहे हैं लातेहार जिला के महुआडांड़ प्रखंड की चटकपुर पंचायत की. इस पंचायत में सरकारी मुलाजिमों की ऐसी कार्यशैली रही कि मानवीय संवेदना भी चूर-चूर हो गयी. लेकिन, सरकारी मुलाजिमों को इसकी फिक्र कहां. इस पंचायत के लोध गांव के 75 वर्षीय सुरजन घासी को इतना मजबूर कर दिया कि वह भुखमरी के कगार पर आ गये हैं. सुरजन ने राशन कार्ड बनवाने के लिए घर का खपड़ा बेच दिया. खपड़ा बेचकर 1000 रुपये राशन डीलर को दिये. सुरजन की छत तो चली ही गयी, 1000 रुपये भी जाया हो गये, लेकिन उनका राशन कार्ड नहीं बना.

घर का खपड़ा बेचकर 1000 रुपये घूस दिया, फिर भी नहीं बना राशन कार्ड

 

Bharat Electronics 10 Dec 2019

वे सभी चीजें सुरजन के पास थीं, जिससे बन सकता था राशन कार्ड

सुरजन घासी के पास वे सभी चीजें थीं,जिनसे राशन कार्ड तुरंत बन सकता था. सुरजन ने डीलर को अपना आधार कार्ड, मतदाता पहचानपत्र और बैंक खाता की प्रति भी दी. लेकिन, किसी ने मानवीय संवेदना नहीं दिखायी. सुरजन के पास लगभग डेढ़ एकड़ जमीन है, जिसे उन्होंने अधबंटाई में खेती के लिए दे दी है. इस वर्ष उन्हें खेती से अपने हिस्से का 30 किलो ही धान मिला.

पेंशन से भी महरूम हैं सुरजन

सुरजन घासी को पेंशन भी नहीं मिल रही है. उनकी पेंशन पिछले दो साल से बंद है. सुरजन को आखिरी बार पेंशन 18 जनवरी 2017  को मिली थी. अचानक उनकी पेंशन भी बंद हो गयी. सुरजन की हालत यह है कि उनकी आंखों की रोशनी भी कम हो गयी है. वह अपने नजदीक के लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं. उनका भांजा लोध गांव में चौकीदार है. वह कभी-कभी 1-2 किलो चावल दे जाता है. फिलहाल उसी से सुरजन की जिंदगी चल रही है. इनकी पेंशन रुकने की लिखित शिकायत मनरेगा सहायता केंद्र के माध्यम से मई-जून एवं दिसंबर 2018 में संबंधित राजस्व कर्मचारी के पास की गयी. लेकिन, आवेदन पर सरकारी कर्मचारी किसी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई नहीं कर रहे हैं. राशन कार्ड के लिए आवेदन अब तक जमा नहीं लिया जा रहा है.

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