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अपने अधिकारों की हिफाजत के लिए भारतीय मीडिया को आस्ट्रेलियन मीडिया से सीखने की जरूरत है

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Faisal Anurag

दुनिया के अनेक देशों में मीडिया अपनी आजादी के लिए खुला संघर्ष कर रही है. लोकतंत्र के प्रहरी ने लेागों के जीने के अधिकार की हिफाजत के लिए सरकारों के खिलाफ सख्त कदम उठाये हैं. आस्ट्रेलियाई मीडिया ने जानने के अधिकार के लिए आक्रामकता दिखाते हुए वह कदम उठाया जिसकी कल्पना भी सरकार को नहीं थी.

21 अक्तूबार की सुबह जब सुबह पाठकों ने अखबार देखा, तो वे भी चौंक गये. अखबारों के पहले पन्ने केवल काले लाइनों से भरे हुए थे और उसमें एक लोगो  लगा हुआ था, जिसमें जानने के हक की मांग को बुलंद किया गया था. आस्ट्रेलियन लोकतंत्र में यह पहला मौका है जब अखबार और चैनलों का एक साथ प्रतिरोध इस तरह उभरा.

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यह प्रतिरोध दो घटनाओं की प्रतिक्रिया के बाद हुआ. एक व्सिलब्लोर ओर उसके तथ्यों को छापने वाले संवाददाता के खिलाफ की गयी पुलिस की सख्त कार्रवाई और छापे के बाद मीडिया ने यह कदम उठाया.

अस्ट्रेलिया के लोकतंत्रवादी और  मीडिया सरकार के जानने के हक को सीमित किये जाने के बाद से ही नाराजगी जता रहे हैं. आस्ट्रेलिया के 79 प्रतिशत लोग मानते हैं कि हर एक को जानने का हक है. विवाद की शुरुआत तब हुई थी जब एक पत्रकार ने सांसदों की जीवन शैली  और उनको मिलने वाली तमाम सुविधाओं के बारे में जानकारी की मांग की थी.

यह सूचना देने से सरकार पीछे हट गयी. 85 प्रतिशत आस्ट्रेलियन नागरिक मानते हैं कि जानकारी को छुपना गलत है.

आस्ट्रेलिया की मीडिया के इस प्रतिरोध ने यह बताया है कि लोकतंत्र में मीडिया की आजादी का क्या महत्व है. उसके प्रति किस तरह की सजगता की जरूरत है. दुनिया के अनेक देशों के शासक मीडिया की स्वतंत्रता को छीनने का अलग-अलग तरीका अपना रहै हैं.

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2018 के सिंतंबर में अमरीका के बोस्टन ग्लोग की पहल पर 300 मीडिया समूहों ने संपादकीय लिख कर ट्रंप की उन नीतियों का कड़ा विरोध किया था, जो मीडिया को नियंत्रित करने के लिए दबाव के रूप में इस्तेमाल किये गये थे.

ट्रंप अमरीकी मीडिया के खिलाफ लगातार अपमानजनक टिप्पणियां करते रहते हैं और वे मीडिया को फेक न्यूज का स्त्रोत बता कर उस पर दबाव बनाते हैं. अमरीका के अलावे भी कुछ अन्य देशों में मीडिया के भीतर से दबावों के खिलाफ आवाज बुलंद होती ही रहती है.

भारत इसमें अपवाद साबित हो रहा है. भारत की मीडिया स्वतः अपनी आजादी को समर्पित करने की भयावह मानसिकता का शिकार है. भारत की मीडिया की साख दुनिया भर में काफी नीचे है. भारत में मीडिया की स्वतंत्रता उन थोड़े से देशो, जहां लोकतिंत्र नहीं है- के बराबर आंका जा रहा है.

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अनेक रिपोर्ट इसे लेकर विश्वमंच की विभिन्न संस्थाओं ने जारी किये हैं. जब कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है. इमरजेंसी के बाद पिछले कुछ सालों में मीडिया का दंडवत होना बताता है कि बीमारी सामान्य नहीं है. लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका के तौर पर मीडिया की भूमिका अनेक सवालों से घिरी हुई है.

इमरजेंसी में तो मीडिया पर दबाव था. सेंसरशिप की तलवार लटकी हुई थी. लेकिन आज का मीडिया वैचारिक रूप से एक अनुदारवादी प्रवृति के साथ खड़ा होने में गर्व महसूस कर रहा है. लोकतंत्र का काला पहलू मीडिया के आत्मसमर्पण के साथ ही विस्तारित होता है. भारत में तो सूचना के अधिकार को भी सीमित किये जाने की लगातार कोशिश की जा रही है.

और जानने के हक का सवाल तो अभी दूर का सपना ही बना हुआ है.

फ्रांस की राज्यक्रांति के गर्भ से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का जो विचार उभरा था और जिसने सामंतवाद को खत्म कर दिया, आज दुनिया भर के जनतंत्र का मूल स्वर है. भारत के संविधान की प्रस्तावना भी स्वतंत्रता, समानता और  बंधुत्व के मूल्यों को लोकतंत्र की बुनियाद बताता है. मीडिया से अपेक्षा होती है कि वह तथ्यात्मकता पर जोर देते हुए लोकतंत्र के विस्तार के अभियान का विश्वसनीय प्रहरी बने.

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भारत की मीडिया अपनी इस पहचान से विलग हो गयी है. जो उसके संघर्षों की दास्तान से ओतप्रोत है. आंध्रप्रदेश में चार पत्रकारों की जिस तरह हत्या की गयी और दो चैनलों को प्रतिबंधित किया गया, उसे लेकर जिस तरह की देशव्यापी सख्त प्रतिक्रिया की अपेक्षा थी, वह नहीं हुई. प्रेस कांउसिल और एडिटर्स गिल्ड ने भी सख्त नजरिया नहीं अपनाया.

यह असामान्य स्थिति बताती है कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. चारों हत्याओं में भाजपा के सहयोगी सरकार की पार्टी के विधायकों की अंतरलिप्तता है. रमण सिंह के जामाने में छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के उत्पीड़न की कहानी तो सर्वविदित है.

बावजूद इन गंभीर मामलों को लेकर मीडिया की खामोशी तो सामन्य नहीं ही है. सूचना के अधिकार को सीमित करने के प्रयासों पर भी मीडिया में आमतौर पर चुप्पी ही दिख रही है. भारत के अनेक व्सिलब्लावर अकेले छोड़ दिये गये हैं.

उनमें से ही कई को जेल में डाल दिया गया है. इससे जाहिर होता है कि भारत में सूचना और जानने के हक को लेकर किस तरह का सन्नाटा व्याप्त है. भारत के चैनलों पर तो सांप्रदायिक बहसों का वर्चस्व है.

नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी का यह कथन बेहद अहम है कि लिबरलों ने लोकतंत्र का बचाव करने के बजाय लोकतंत्रविरोधी मानसिकता को ही अपना लिया है. भारत के मध्यमवर्गीय लिबरल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं.

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