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हेमंत करकरे पर प्रज्ञा ठाकुर के बयान को कुतर्क से सही ठहराना भयावह

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Harsha Vardhan Mandava

भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने आतंकवाद निरोधी दस्ते के पूर्व चीफ हेमंत करकरे पर भद्दी टिप्पणी की है. हेमंत करकरे 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले में आतंकवादियों के साथ लड़ते हुए शहीद हुए थे. इन बयानों का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि अब शहीद के परिवार के सदस्यों पर भी खतरा है. हालांकि कुछ खबरें यह आ रही हैं कि वह बयान वापस ले लिया गया है, लेकिन तथ्य यह है कि जनता के सेवक होने जा रहे एक व्यक्ति ने ये बातें कहीं. इस मामले में जांच किये जाने की जरूरत है कि अपनी ड्यूटी निभाते हुए शहीद होनेवाले पुलिस अफसर के प्रति ऐसा कथन क्यों. एक सुर से इस बयान का विरोध करने के बजाए सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर लोग इस बयान के पक्ष में कुतर्क देते हुए सही ठहरा रहे हैं, जो कि भयावह है.

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आजादी से अब तक राज्य सेवा और केंद्रीय सेवा के विभिन्न रैंकों के करीब 34 हजार पुलिस कर्मी शहीद हो चुके हैं. वर्ष 2018 में 400 से अधिक पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपने प्राणों से हाथ धो बैठे, क्योंकि वे अपनी ड्यूटी से बंधे हुए थे. ये आंकड़े विश्व में सबसे ज्यादा हैं. दुर्भाग्य से हम एक ऐसे देश में हैं जहां हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधियों में से काफी ऐसे हैं, जो आपराधिक इतिहास रखते हैं. हमारी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि आपराधिक इतिहास वाले लोग नेता बन जाते हैं. जाहिर तौर पर कानून की रक्षा करनेवाले और उनके बीच का रिश्ता मैत्रीपूर्ण नहीं रहता और वे उन्हें कोसते रहते हैं.

सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में इसे मान्यता मिली हुई है और इसी के साथ यह भाव भी चला आता है कि यह उनका हक है. हम यह अक्सर देखते हैं कि पुलिसकर्मियों को अपनी ड्यूटी करते वक्त धमकाया जाता है और उन्हें अपना कर्तव्य करने से रोका जाता है. यहां तक कि ट्रैफिक नियमों का पालन कराने औऱ वाहनों की चेकिंग जैसी आम पुलिस की ड्यूटी पर भी उन्हें दबाव का सामना करना पड़ता है. खुद को कानून से परे समझना और सर्वोपरि होना जैसी गलत धारणा के कारण ही जघन्य अपराधों के अनुसंधान के क्रम में भी पुलिस अफसरों को दबाव का सामना करना पड़ता है. अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपने प्राणों की आहुति देनेवालों के प्रति दुर्भावना रखना और उन्हें अपमानित करना स्वीकार्य नहीं है. एक ऐसे व्यक्ति का अपमान जिसने अपनी ड्यूटी के दौरान प्राणों का बलिदान दिया हो और वह खुद का और अपने परिवार के सदस्यों का बचाव भी नहीं कर सकता हो, उसके बारे में ऐसा कहना सार्जनिक भाषण के स्तर को एक नये गर्त में ले गया है.

इसका एक कारण है कि क्यों समाज उन लोगों को याद करने को महत्व देता है और उनका सम्मान करता है जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया हो. पुलिस विभाग में काम कर रहे लोगों का मनोबल तब बढ़ता है जब कृतज्ञय देश के लोग उनके बारे में अच्छी बातें कहते हैं वह चाहे सांकेतिक रूप से ही क्यों न हो. उनका बनोबल तब कई गुना बढ़ जाता है जब वो देखते हैं कि उनके शहीद साथियों के परिवार की सही तरह से देखभाल की जा रही हो. अपने काम से वो गर्वान्वित होते हैं, जब वो देखते हैं कि शहीद के परिवार को मान-सम्मान मिल रहा है. नयी दिल्ली में खुला नेशनल पोलिस मेमोरियल सही दिशा में उठाया गया एक कदम है. ‘भारत के वीर’ जैसी पहल भी महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकते हैं. समाज के लिए यह समय है कि पुलिस के शहीदों के प्रति अपना कर्तव्य निभायें. यह अनिवार्य है कि सिविल सोसाइटी एक सुर से इस शहीद और उनके परिवारवालों के हुए अपमान के खिलाफ खड़ें हों ताकि उन्हें यह महसूस हो कि उनका यह बलिदान औऱ सम्मान राजनीतिक अभियान के लिए बिकाऊ नहीं हैं.

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अगली बार जब किसी पुलिसकर्मी के सामने यह खतरनाक परिस्थित आये कि देश की जनता के प्राणों के लिए उसे खुद को खतरे में डालना पड़े तो वह गर्व के साथ यह जोखिम ठा सके. याद रखे, किसी के लिए भी विकलप् हमेशा खुला रहता है. इस बात का विकल्प की वह दूसरी तरफ देखे और बाद में सिस्टम को दोष दे. जब ग्राउंड लेबल पर काम कर रहे पुलिसकर्मी को यह लगे कि उसके और उसके परिवार का ध्यान सही से नहीं रखा जायेगा, तो यह देश पर श्राप के समान होगा.

लेखक आइपीएस अफसर हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

यह आलेख मूलतः अंग्रेजी वेबसाइट द प्रिंट में प्रकाशित हुआ है, हम उसका हिंदी अनुवाद यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

इसे भी पढ़ें – आतंकियों को पता है कि अगर देश में धमाका किया तो मोदी पाताल से ढूंढ़ कर  सजा देगा

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