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जिस महतो वोट बैंक पर था जगरनाथ को भरोसा, उसी ने किया किनारा, कांग्रेसियों का प्यार तो मिला पर वोट नहीं

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: एक ऐसा कद्दावर नेता, जिसने राजनीति में आते ही ऐसा दहाड़ा कि लोगों ने उसे टाइगर कहना शुरू कर दिया. लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड. लेकिन जब भी उसने लोकसभा चुनाव लड़ने की सोची, उसे हार का मुंह देखना पड़ा. और 2019 के लोकसभा में तो उसे ऐसी हार का सामना करना पड़ा, जैसे किसी ने किसी को दिन में तारे दिखा दिये हों. बात हो रही है जेएमएम से डुमरी विधायक जगरनाथ महतो की. इनके जनाधार की मजबूती इस बात से समझी जा सकती है कि लाख कोशिशों के बाद भी जेएमएम इनका टिकट नहीं काट सका. महागठबंधन और जेएमएम ने इन्हें हमेशा ही विनिंग कैंडिडेट माना. लेकिन हुआ उलटा. पिछली बार 40,313 वोटों से और 2019 में करीब 2.48 लाख वोटों से हारनेवाले उम्मीदवार बन गये जगरनाथ. आखिर ऐसी क्या वजहें रहीं होंगी, जिसने जगरनाथ महतो जैसे जमीन से जुड़े नेता को जमीन दिखा दी.

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जिसने फलक पर बिठाया, उसी ने पाताल पहुंचाया

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जगरनानाथ महतो 2005 से लगातार तीन बार डुमरी से विधायक हैं. उन्होंने तीनों बार महतो उम्मीदवार को ही हरा कर जीत हासिल की है. 2005 में राजद के टिकट से लड़ रहे लालचंद महतो को 18,010 वोट, 2009 में जदयू के टिकट से लड़ रहे दामोदर प्रसाद महतो को 13,668 वोट और 2014 में बीजेपी के टिकट से लड़ रहे लालचंद महतो को 32,481 वोट से हराया था. जाहिर तौर पर महतो के वोट बैंक और मांझी-मुस्लिम समीकरण के दम पर ही जगरनाथ जीत की पताका फहराते रहे. 2014 में गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र में 9,69,997 वोटरों ने अपने मत का इस्तेमाल किया था. एक अनुमान के मुताबिक इस बार गिरिडीह लोकसभा में करीब पांच लाख महतो वोटर थे. इस बार के चुनाव में चंद्रप्रकाश चौधरी और जगरनाथ के बीच फाइट थी. दोनों कुर्मी नेता हैं. जगरनाथ महतो आश्वस्त थे कि उन्हें हर बार की तरह कुर्मी वोटरों का साथ मिलेगा और उनकी नैया पार हो जायेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मुस्लिम और आदिवासी वोट तो जगरनाथ को मिले. लेकिन कुर्मी वोट करीब 80 फीसदी चंद्रप्रकाश चौधरी की तरफ चले गये. कुर्मी वोटरों को अपनी तरफ शिफ्ट कराने में चंद्रप्रकाश चौधरी को मोदी मंत्र काम आया. मोदी जाप ने आखिरकार चंद्रप्रकाश को परिणाम दे ही दिया. और कुर्मी वोटरों के दम पर गिरिडीह के चौथे कुर्मी सांसद बने चंद्रप्रकाश चौधरी.

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कांग्रेस वोट शिफ्ट कराने में रही नाकाम

जगरनाथ महतो को उम्मीद थी कि उन्हें कांग्रेसियों का साथ पूरी तरह से मिलेगा. इसमें पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह का रोल काफी अहम था. लेकिन राजेंद्र सिंह को जितना भरोसा अपने वोटरों पर था, वोटर उस कसौटी पर खरे नहीं उतरे. चाहे कोयला मजदूर की बात हो, आरसीएमसी से जुड़े लोगों की बात हो या इंटक के संबंधित लोग और उनके परिवार की बात हो. बमुश्किल 25 फीसदी वोट ही कांग्रेस का जगरनाथ की तरफ शिफ्ट हुआ. कांग्रेसियों ने पूरी चुनाव तैयारी के दौरान आश्वासन तो दिया, लेकिन मतदान के दिन वोट नहीं दिया. इसका असर साफ तौर से नतीजे पर देखा जा सकता है.

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मोदी फैक्टर तो था ही

ऐसा नहीं है कि आजसू की तूफानी चुनावी तैयारियों की वजह से चंद्रप्रकाश चौधरी दिल्ली पहुंचे हैं. इससे पहले आजसू सुप्रीमो के ससुर यूसी मेहता अपनी किस्मत आजमा चुके हैं. उन्हें बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था. चंद्रप्रकाश चौधरी, सुदेश महतो और लंबोदर महतो समेत सभी आजसू कार्यकर्ताओं ने बस एक ही मूल मंत्र पकड़ा वो था, मोदी-मोदी का. मोदी-मोदी के जाप का नतीजा यह हुआ कि वोटिंग जाति से ऊपर उठ कर हुई. नतीजा यह हुआ कि जगरनाथ महतो जैसे कद्दावर नेता को रामगढ़ से आया एक विधायक हरा कर सांसद बन गया.

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