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जमशेदपुर : विरोध प्रदर्शन कर आदिवासियों ने कहा- जंगल के दावेदारों को जंगल से बेदखल करने के खिलाफ अध्यादेश लाये सरकार

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Jamshedpur : पूर्वी सिंहभूम उपायुक्त कार्यलाय के समक्ष शनिवार को झारखंडी समाज के बैनर तले आदिवासियों ने वन अधिकार कानून के प्रति सरकार के उदासीन रवैये को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान प्रदर्शन कर रहे आदिवासी समाज के लोगों ने सरकार से मांग की कि जंगल के दावेदारों को जंगल से बेदखल करने के खिलाफ स्टे नहीं, बल्कि संसद में अध्यादेश लाया जाये. इस मौके पर प्रदर्शनकारियों ने उपायुक्त, पूर्वी सिंहभूम के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भी दिया गया.

क्या है ज्ञापन में

  • 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने Wild Life First & others V/s union of India & Others मामले में जिलास्तरीय वन अधिकार समिति द्वारा निरस्त करीब 11 लाख वन अधिकार दावेदरों को अपने दावित वन क्षेत्र से बेदखल करने के अंतरिम आदेश को हम दुर्भग्यपूर्ण मानते हैं.
  • उसके लिए हम केंद्र और रज्य सरकारों को जिम्मेदार मानते हैं, क्योंकि बीती चार तारीखों में केंद्र और राज्य सरकारें वन अधिकार कानून और उसकी प्रक्रियाओं को कोर्ट में प्रभावी ढंग से रखने में बुरी तरह विफल रही.
  • वन अश्रित समुदायों के देशव्यापी विरोध को देखकर, देर से सही, केंद्र सरकार ने कोर्ट में हस्ताक्षेप किया और कोर्ट ने 28 फरवरी 2019 को चार महीनों के लिए बेदखली का आदेश स्थगित रखा है. हम इसका स्वागत करते हैं. लेकिन, बेदखली की तलवार वन आश्रित समुदायों के ऊपर अभी भी लटकी हुई है. क्योंकि चार महीने बाद न्यायालय बेदखली के आदेश को बहाल कर सकता है.
  • हमारा मानना है पूरे झारखंड में जो दावे पूर्ण रूप से निरस्त हुए हैं और जो दावे आंशिक रूप से निरस्त हुए हैं (दावित वन क्षेत्र के रकबा में बिना कोई वजह के कटौती करके), सभी वन अधिकार अधिनियम 2006 और 2012 में संशोधित वन अधिकार नियमावली 2008 के प्रावधानों का घोर उल्लंघन करके निरस्त हुए हैं.
  • वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी की गयी.
  • कानून में स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद अनुमंडल और जिलास्तरीय समितियों ने ग्रामसभा की सिफारिश को दरकिनार करते हुए वन विभाग की सिफारिशों के आधार पर दावों को निरस्त किया, जो कानून का उल्लंघन है.
  • अनुमंडलस्तरीय समिति ने अपने निर्णय के बारे में दावेदारों को सूचना नहीं देकर उन्हें अपील करने के उनके कानूनी हक से वंचित किया.
  • जिलास्तरीय समिति ने अपने निर्णय की लिखित सूचना दावेदारों को नहीं दी और उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी उपाय करने के अवसर से वंचित किया.
  • राज्य की निगरानी समिति ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया. कई वर्षों से उनकी बैठक भी नहीं हुई वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन की निगरानी करने के लिए. जिला प्रशासन और राज्य सरकार की कानून विरोधी कार्रवाई की हम भर्त्सना करते हैं.
  • जिलास्तरीय समिति से पूर्ण रूप से खारिज और आंशिक रूप से खारिज सभी दावों पर पुनर्विचार हो.
  • यह पुनर्विचार ग्रामसभा के स्तर पर हो, क्योंकि दावों का भौतिक सत्यापन करने के लिए और दावेदार और संबंधित विभागों के प्रतिवेदन पर विचार करके उचित प्रस्ताव पारित करने और अनुमंडलस्तरीय समिति के पास भेजने का अधिकार कानून में सिर्फ ग्रामसभा और उसके नाम पर ग्राम वन अधिकार समिति को है.
  • अनुमंडल और जिलास्तरीय समितियां यह सुनिश्चित करें कि वन अधिकार समिति की लिखित सूचना पर वन और राजस्व विभाग के अधिकारी दावों के भौतिक सत्यापन में उपस्थित रहते हैं और भौतिक सत्यापन प्रतिवेदन में अपना प्रतिवेदन, यदि कोई हो, लिखकर अपना पदनाम और तारीख देकर हस्ताक्षर करें.
  • अनुमंडल और जिलास्तरीय समितियां ग्रामसभा की सिफारिशों का सम्मान करें. वन और राजस्व विभग ग्रामसभा के निर्णय पर आपत्ति अनुमंडल अथवा जिलास्तरीय समिति के पास करते हैं, तो उन्हें बाध्य करें कि साक्ष्य के साथ लिखित में अपनी आपत्ति को रखें. उन्हें यह स्पष्ट करने के लिए बाध्य करें कि क्यों इन आपत्तियों को दावों के भौतिक सत्यापन के समय नहीं उठाया गया.
  • 2005 के बाद वन विभाग द्वारा दायर अतिक्रमण का सभी मुकदमा वापस हो.
  • वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत जंगल का संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन का सामुदायिक वन अधिकार और गौण वन उत्पादों पर मालिकाना अधिकार देने की प्रक्रिया में तेजी लायें.
  • गैर वनीय काम के लिए वनों के उपयोग के लिए संबंधित ग्रामसभा से सहमति लेना सख्ती से लागू करें. क्षतिपूरक वनरोपण के सभी कार्यक्रम संबंधित ग्रामसभा के पूर्ण नियंत्रण में हो.
  • CAMPA अधिनियम 2016 को निरस्त करें और वन अधिकार कानून सम्मत CAMPA कानून बनायें, जिसके केंद्र में ग्रामसभा हो.

कार्यक्रम में ये रहे मैजूद

कार्यक्रम में दीपक रंजीत, सन्नी सामद, सिकंदर चंपिया, सुकुमार सोरेन, सावना मार्डी, महेश सामद, निकिता सोय, लक्ष्मी बिरुआ, दुर्गा बोयपाय, जसमी सोरेन, हरीश तामसोय, पंकज देवगम, संजीव बिरुआ, संजू बिरुआ, कुंवार बेसरा, अनिल मार्डी, अजय मुंडा, रोशन मुंडा, सुनील कर्मकार, आशा देवी, जोनी किस्कू, रोशन मुंडा, देवराज मुंडा, कुंवर लालजी, शीला किस्कू, सलोनी मस्सी, संध्या कर्माकर, पोकली मुर्मू, सुनील हेम्ब्रम, अनूप माहतो, संजय कर्मकार, कृष्णा लोहार, ललन प्रसाद, इश्तियाक अहमद जौहर, प्रणब महतो आदि मौजूद थे.

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