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झारखंड पुलिस के अफसर अक्षम हैं या चुप रहने की कीमत वसूल रहे थे टीपीसी से

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–              जिस टीपीसी के खिलाफ झारखंड पुलिस के अफसर चुप रहे, अब एनआइए उसपर कर रहा चार्जशीट

Surjit Singh

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प्रतिबंधित नक्सली संगठन टीपीसी के उग्रवादियों के खिलाफ एनआइए लगातार चार्जशीट दाखिल कर रहा है. टीपीसी के कई उग्रवादियों को एनआइए ने गिरफ्तार भी किया. जो अभी जेल में बंद हैं. जो फरार हैं, एनआइए उन सबकी तालाश कर रहा है. एक जुलाई को भी एनआइए ने एक मामले में चार्जशीट दाखिल किया. चूंकि चार्जशीट दाखिल किया गया है, तो अभी यह मानना ही पड़ेगा कि टीपीसी उग्रवादियों के खिलाफ सबूत हैं. हालांकि अभी कोर्ट का फैसला आना बाकी है.

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एनआइए की कार्रवाई वर्ष 2018 से शुरु हुई. टीपीसी की अवैध वसूली वर्ष 2013-14 से चल रही थी. 2015 के बाद वसूली ने रफ्तार पकड़ी. हर माह 15-17 करोड़ की अवैध वसूली. कोयला कारोबार के ट्रांसपोर्टरों से. सबको पता था. पूर्व में चतरा में पदस्थापित रहे कई पुलिस अधीक्षकों से लेकर सीआइडी, पुलिस मुख्यालय, गृह विभाग और सत्ता शीर्ष तक के अफसरों को. अलग-अलग स्तर से हर किसी ने वसूली की पुष्टि की. पर किसी ने कड़ी कार्रवाई नहीं की. जांच शुरु नहीं करायी.

पुलिस मुख्यालय से लेकर चीफ सेक्रेटरी तक यही कहते रहे कि एसआइटी बनाकर जांच की जाये. सरकार भी चुप ही रही. जिस आइपीएस अनिल पाल्टा (तत्कालीन एडीजी लॉ एंड आर्डर) ने कार्रवाई शुरु की, उसे पद गंवाना पड़ा.

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चूंकि अब एनआइए की कार्रवाई में लाखों रुपये बरामद हुए. एके-47 जैसे हथियार बरामद किये गये. टीपीसी उग्रवादियों द्वारा अर्जित संपत्तियों को जब्त किया गया. तो इस सच को मानना ही पड़ेगा कि वसूली हो रही थी. पर, किसके संरक्षण में. जो कार्रवाई एनआइए ने की, क्या वह कार्रवाई झारखंड पुलिस नहीं कर सकती थी. क्या झारखंड पुलिस के अफसर कार्रवाई करने में अक्षम थे, या फिर आंख बंद रखने व चुप रहने की कीमत वसूल रहे थे.

या फिर वह कौन सा दबाव था, जिसके कारण कार्रवाई शुरु नहीं की गयी. किसी अफसर ने कार्रवाई शुरु की, तो उसे तुरंत क्यों हटा दिया गया. इन सब सवालों का जवाब शायद ही कभी सार्वजनिक हो. शायद ही कभी लोग जान पायेंगे कि किस अफसर ने चुप रहने के बदले क्या-क्या लाभ लिया. शायद ही एनआइए भी इन सवालों का जवाब ढ़ूंढ़ने में दिलचस्पी दिखाये.

बहरहाल, एनआइए की कार्रवाई ने झारखंड पुलिस की इकबाल, साख और ईमानदारी पर बट्टा तो लगा ही दिया है. इस दौरान कौन-कौन अफसर महत्वपूर्ण पदों (जो जांच कर सकते थे, करा सकते थे, एसआइटी बना सकते थे) पर रहें, उनमें से किसी एक का नाम लेना उचित नहीं होगा. पर, सबकी संविधान, कानून व कर्तव्य के प्रति ईमानदारी पर सवाल तो खड़ा हो ही गया है. साथ ही एनआइए के एक्शन के बाद बहुमत वाली सरकार की “जीरो टॉलरेंस” वाली बात भी लोगों के गले नहीं उतर रही.

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