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झारखंडः जब आती है बड़े नेता या अधिकारी की बात तो सरकार जांच तक की अनुमति नहीं देती

-कोर्ट को आदेश का भी अमल नहीं, आरोपी हैं रघुवर दास

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: इसे संयोग नहीं साजिश कह सकते हैं. या इसे सरकारी तंत्र का ऐसा जाल कह सकते हैं, जो किसी बड़े अधिकारी या नेता को बचाने के लिए बुना जाता है. किसी भी तरह का आरोप, किसी पर लगने के बाद जांच एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है.

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अगर गाज छोटे किसी पर गिरना हो तो, जांच होती है और गाज भी गिर जाती है. लेकिन झारखंड में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें साफ तौर से देखा जा रहा है कि अगर कोई अधिकारी या बड़े नेता फंसने वाला हो, तो जांच तक की अनुमति देने से सरकार बचती है.

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मामला कोर्ट में जाता है, कोर्ट का फैसला भी आता है, लेकिन कार्रवाई या कार्यवाही दोनों नहीं होती. ऐसा ही दो केस स्टडी आपके सामने न्यूज विंग रख रहा है. जो सालों से अटके हैं. अब कोर्ट की फाइलों में दबे हैं.

Bharat Electronics 10 Dec 2019

केस स्टडी वन

मैन हर्ट मामले में कोर्ट का आदेश भी ताक पर रघुवर दास हैं आरोपी

मामला वर्ष 2006 का है. उस वक्त नगर विकास मंत्री वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास थे. उनपर आरोप है कि रांची शहर में सिवरेज और ड्रेनेज के लिए उन्होंने सारे नियम को ताक पर रखकर मैनहर्ट कंपनी को काम दे दिया था.

रांची शहर में सिवरेज और ड्रेनेज को लेकर काम होना था. विभाग ने इस काम के लिए ORG/SPAM Private Limited का चयन किया. कंपनी ने काम शुरू कर दिया. करीब 75 फीसदी डीपीआर बनने के बाद कंपनी से काम वापस ले लिया गया और काम मैनहर्ट कंपनी को दे दिया गया.

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आरोप है कि मैनहर्ट को काम देने के लिए विभाग ने शर्तों का उल्लंघन किया. शर्त थी कि उसी कंपनी को काम मिलेगा, जिसका टर्नओवर 300 करोड़ है और जिसे सिवरेज-ड्रेनेज दोनों काम में तीन साल काम करने का अनुभव हो.

मैनहर्ट शर्तों को पूरा नहीं करता था. बावजूद इसके विभाग ने इस कंपनी को काम दे दिया. मामला विधानसभा में उठा. विधानसभा ने जांच के लिये एक कमेटी बनायी. जिसमें सरयू राय, प्रदीप यादव और सुखदेव भगत सदस्य थे. समिति ने रिपोर्ट सौंपी की मैनहर्ट को काम देने में गड़बड़ी हुई है.

साथ ही एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच करने की सिफारिश की. लेकिन जांच नहीं हुई. वर्ष 2010 में मो. ताहिर नाम के एक शख्स ने मामले को लेकर हाईकोर्ट में पीआईएल किया. जिसके वकील राजीव कुमार थे.

पीआईएल की सुनवाई करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस भगवती प्रसाद और नरेंद्र नाथ तिवारी ने 18 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया. दो जजों वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को डीजी विजिलेंस के पास जाकर शिकायत दर्ज कराने के लिए कहा.

आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता की शिकायत में किसी तरह कोई सच्चाई है, तो आगे की कानूनी कार्रवाई हो. विजिलेंस ने पीई दर्ज करते हुए मामले की जांच की. जांच में गड़बड़ी पायी गयी.

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मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए विजिलेंस आईजी एमवी राव की तरफ से पांच बार मार्गदर्शन मांगे जाने के बावजूद निगरानी आयुक्त कार्यालय से कोई मार्गदर्शन नहीं आया. बताते चलें कि उस वक्त निगरानी आयुक्त राजबाला वर्मा थीं.

मामले में एक के बाद तीन पीआईएल हुए. आखिरी सुनवाई में 28 सितंबर 2018 को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अनिरुद्ध घोष और जस्टिस डीएन पटेल की बेंच ने अहम फैसला सुनाया है.

दो जजों वाली इस बेंच ने फैसला सुनाया है कि मामले में तत्कालीन आईजी विजिलेंस एमवी राव की चिट्ठी पर निगरानी आयुक्त एक वाजिब समय में निर्णय लें. लेकिन आलम यह है कि आठ महीने बीतने के बावजूद विजिलेंस कमिश्नर की तरफ से कोर्ट के आदेश के आलोक में किसी तरह का कोई फैसला नहीं लिया गया है.

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केस स्टडी टू

गलत टिन नंबर का इस्तेमाल कर हुई करोड़ों रुपए की चोरी, आरोपी हैं सुरेश सेराफिम

घटना 2015 की है. रामगढ़ के कुछ कोयला ट्रांस्पोर्टरों पर आरोप लगा कि उन्होंने गलत टिन नंबर का इस्तेमाल कर कोयले की ढुलाई कर सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व का नुकसान पहुंचाया है.

मामले में कुछ कोयला ट्रांस्पोर्टरों के यहां छापेमारी की गयी. बात सामने आयी. सरकार की तरफ से एसीबी से जांच करने को कहा गया. एसीबी ने पीई (preliminary enquiry) दर्ज करते हुए जांच शुरू की.

एसीबी के पुलिस अधीक्षक ने तीन नवंबर 2016 को सचिव वाणिज्य कर को चिट्ठी लिख कर मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के लिए अनुमति मांगी. एसीबी के पुलिस अधीक्षक की चिट्ठी का विषय था सुरेश सेराफिम (तत्कालीन वाणिज्य कर आयुक्त), बैजनाथ राम (लिपिक), युगल किशोर (तत्कालीन वाणिज्य कर आयुक्त), कृष्ण कुमार वर्मा (प्रधान लिपिक) के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने के लिए मंतव्य के संबंध में.

अधीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि मामले में आरोपी लोगों और कंपनियों द्वारा कोयला का व्यापार जाली कागजात और गलत तरीके का उपयोग करके किए जाने से झारखंड सरकार को होने वाले कर की क्षति, करोड़ों रुपए का कर राजस्व नुकसान करने के आरोप में मुख्यमंत्री झारखंड सरकार के आदेशनुसार सरकार के उप सचिव मंत्रिमंडल सचिवालय और निगरानी विभाग के पत्र संख्या 932 दिनांक 29 मई 2015 के आलोक में पीई दर्ज कर जांच शुरू की गयी. पीई की जांच रिपोर्ट विभाग को सौंपते हुए सभी आरोपियों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश मांगा गया.

लेकिन विभाग ने एसीबी को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश ना देते हुए मामले में महाधिवक्ता से राय ली. महाधिवक्ता ने सीधे तौर पर कहा कि मामले में सुरेश सेराफिम कहीं दोषी नहीं हैं. अब मामले को लेकर कोर्ट में पीआईएल हुई है. कोर्ट की कार्यवाही चल रही है.

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