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न्याय की आस में दर-दर भटक रहे हैं झारखंड के 514 युवा , राज्यपाल से सीबीआई जांच की मांग

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Ranchi : फर्जी नक्सली सरेंडर के नाम पर 514 युवाओं को रांची के पुराने जेल परिसर में दो साल तक रखा. मामले की जांच भी हुई. लेकिन युवाओं को अब तक न्याय नहीं मिला. मिला तो माथे पर सिर्फ नकसली होने का ठप्पा. बहुचर्चित फर्जी नक्सल सरेंडर से जुडे़ युवाओं ने आज राजभवन पहुंच कर न्याय और इंसाफ की गुहार लगाई. युवाओं ने राज्यपाल से निवेदन किया कि हमारी बंधक जमीन और पैसा वापस कर दिया जाये और पूरे मामले की सीबीआई जांच कराई जाये. हमारी जिंदगी का कीमती समय तो सरकार की नीतियों के कारण बरबाद हो चुका है,  लेकिन अब तक हमें न्याय नहीं मिल सका. युवाओं ने  उच्च न्यायलाय में चल रहे मामले की जल्द से जल्द सुनवाई करने का आग्रह भी किया.

क्या कहते हैं युवा

जमीन बेची, बैल बेचा, रिश्तेदारों से कर्जा लिया और अपनी बेरोजगारी दूर करने एक-दो लाख रुपये भी दिये . इसके बाद जाकर नक्सली बोल युवाओं को झांसे में रख सरेंडर कराया गया. इन युवाओ को नौकरी तो नहीं मिली, मिला नक्सली होने का तमगा. इस तमगों ने उन्हे गांव से दूर कर दिया. आज भी राज्य के 514 युवा समाज और गांव में उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं.

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मामला राज्य के बहुचर्चित फर्जी नक्सल सरेंडर के नाम पर दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट के जरिए साल 2014 में 514 युवाओं को नक्सली बताकर फर्जी तरीके से सरेंडर करने का है. जिसमें पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के शामिल होने की बात भी जांच में सामने आयी थी .जांच में बड़े अधिकारियों ने पाया था कि 514 में से सिर्फ 10 युवाओं का ही नक्सल गतिविधियों से संबंध था. लेकिन जिस तरह से इंस्टीट्यूट में 5 लोगों को आरोपी बताते हुए जांच की फाइल बंद कर दी गयी, जो गलत है.

राजभवन में आये युवकों के अनुसार  दूसरों के बहकावे में और नौकरी  के लालच में नक्सली बनना स्वीकार किया. दो साल तक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया.  सरकारी कैम्पस में रख कर प्रशिक्षण भी दिया गया, लेकिन पूरे मामले का फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद  हमें न्याय नहीं मिल पाया.    युवाओ का कहना है कि अब हम न्याय के लिए उन तमाम बडे़ अधिकारियों का नाम सामने लायेंगे,  जो प्रशिक्षण के दौरान आये थे.    तत्कालीन एसपी युवाओं से साक्षत्कार लेने जेल परिसर आये थे. वे राज्य के बड़े पुलिस अधिकारी के रूप में पदास्थापित हैं.

जांच पर सवाल खड़ा करते हुए रनिया के राम लखन नाग कहते हैं कि सरकार की ओर से जो जांच कराई गयी.  वह सिर्फ फर्जीवाड़ा तक ही सीमित रही.  पूरे मामले में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट पर भी सरकार के द्वारा गौर नहीं किया गया. पुलिस के बड़े अधिकारियों के ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए सेरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया, जो बाद में हमलोग की समझ में आया. सरेंडर करने वाले सभी युवाओं का आज तक  पुलिस ने बयान दर्ज नही किया और न ही युवाओं के  पते का पुलिस सत्यापन कर पायी.    जिसके कारण आज भी न्याय के लिए दरदर भटक रहे हैं.

जनक साहू कहते हैं कि जांच में पुलिस अधिकारियों के शामिल होने की बात सामने आने के बावजूद जांच सिर्फ नौकरी के नाम पर फर्जीवाड़े तक सिमटा दी गयी. राज्य के बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए  मामले की सही रूप से जांच नहीं की गयी. पुलिस के बड़े अधिकारियों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग करते हुए हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ किया.

क्या है मामला?

झारखंड सहित देश के दूसरे राज्यों में नक्सलियों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए सरेंडर कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इसी के तहत झारखंड पुलिस ने रवि बोदरा नामक शख्स की सहायता ली. रवि बोदरा ने रांची, गुमला, खूटी, सिमडेगा जैसे नक्सलवाद प्रभावित जिलों में घूम-घूम कर कैंप लगवाया था और सरेंडर पॉलिसी के तहत हथियार के साथ सरेंडर करने का सुझाव युवाओं को दिया. ऐसे में सीआरपीएफ और सेना में नौकरी पाने की लालच मे गांव के युवकों ने जमीन और मोटरसाइकिल बेचकर पैसे दिये थे. युवाओ से कहा गया था कि नक्सली के रूप में सरेंडर करने पर ही नौकरी मिलेगी.

बाद में सभी युवकों को पुराने जेल में रखा गया. मामला सामने आने के बाद पुलिसिया जांच की मंजूरी दी गयी. हैरानी की बात यह रही कि सरेंडर के बाद किसी भी युवक को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया. मानवाधिकार आयोग ने इस प्रकार युवकों को रखने के लिए पुलिस अधिकारियों को दोषी बताया था. वैसे पुलिस ने भले ही फाइल बंद कर दी हो लेकिन यह मामला अभी हाईकोर्ट में लंबित है.

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