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झारखंड के ऊर्जा विभाग ने घाटे में चल रहे पीएसयू में किया निवेश, 2092.21 करोड़ का नुकसान

निवेश से 2092.21 करोड़ का सरकार को नुकसान, नियंत्रक सह महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

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Ranchi: झारखंड सरकार ने घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के 10 उपक्रम (पीएसयू) में निवेश किया है. नियंत्रक सह महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. ऊर्जा मंत्रालय के निवेश की वजह से सरकार को 2092.21 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के दस उपक्रमों में से सिर्फ तीन ने ही 22.98 करोड़ का लाभ अर्जित किया, जबकि पांच उपक्रमों का नुकसान 1700.73 करोड़ रहा. दस उपक्रमों ने सरकार के एकाउंट्स में नकारात्मक उपलब्धि हासिल की है.

सरकार ने 2014-15 से लेकर 2016-17 तक 10 कंपनियों में निवेश करने के लिए कुल निवेश का 6.87 फीसदी कर्ज भी लिया. कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की होल्डिंग कंपनी झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम लिमिटेड के ही कर्मचारी नन वर्किंग कंपनियों में काम कर रहे हैं. सरकार की ऊर्जा से जुड़ी कंपनियों में सबसे अधिक 10524.28 करोड़ का निवेश हुआ है. इनमें से कई के एकाउंट्स भी अद्यतन नहीं हैं.

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तीन कंपनियों में हुआ अधिक निवेश

राज्य की रघुवर सरकार ने घाटे में चल रही झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड, झारखंड ऊर्जा संचार निगम लिमिटेड और तेनुघाट विद्युत निगम लिमिटेड को पुनर्जीवित करने के लिए यह फैसला लिया था. इनमें सरकार की तरफ से 10,083 करोड़ रुपये का ऋण लेकर निवेश किया गया. इन कंपनियों का शेयर कैपिटल मात्र 113.40 करोड़ रुपये ही है.

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कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों के रिकार्ड और सरकार के दावे में 658.88 करोड़ रुपये का अंतर भी है. वित्त विभाग और ऊर्जा विभाग को राशि में हो रहे अंतर को दूर करने के लिए महालेखाकार कार्यालय के साथ मिलकर शीघ्र कदम उठाना चाहिए.

2014-15 और 2016-17 के लिए इंडिया रेटिंग्स द्वारा किये गये एक अध्ययन में कहा गया था कि झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं थी और यह सबसे खराब प्रदर्शन करनेवाला उपक्रम था. कैग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एकाउंट्स को अपडेट करने के लिए सरकार को शीघ्र कदम उठाने चाहिए, ताकि इन उपक्रमों के निदेशक कंपनी अधिनियम के नियमों का निरंतर उल्लंघन नहीं कर सकें.

कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार, कंपनियों के प्रत्येक वार्षिक वित्तीय स्टेटमेंट को अंतिम रूप देना जरूरी रहता है. ऐसा नहीं करने पर दंड का प्रावधान है, जिसमें एक वर्ष की सजा और 50 हजार से लेकर पांच लाख तक का जुर्माना भी हो सकता है. लेकिन इनकी लगातार अनदेखी की जा रही है. सरकार की तरफ से नन वर्किंग सार्वजनिक उपक्रमों में 10033.17 करोड़ रुपये का लंबित ऋण है, जिसका भुगतान तीन वर्ष से नहीं किया गया है. इन उपक्रमों द्वारा ऋण वापसी की संभावना भी नहीं है. सरकार को पुराने कर्ज को शेयर कैपिटल में परिवर्तित करने पर भी विचार करना चाहिए.

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