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जेएनयू प्रशासन ने मांगा था Curriculum Vitae,  इतिहासकार रोमिला थापर ने जमा करने से इनकार किया

रोमिला ने कहा कि मैं जेएनयू को अपना सीवी साझा करने की इच्छा नहीं रखती.

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NewDelhi : इतिहासकार रोमिला थापर ने जेएनयू प्रशासन को अपना सीवी देने से इनकार कर दिया है. खबरों के अनुसार  रोमिला थापर से जवाहरलाल नेहरूविश्वविद्यालय प्रशासन ने उनका सीवी (Curriculum Vitae) जमा करने के लिए कहा था. जिसके बाद रोमिला ने अपनी सीवी देने से साफ इनकार कर दिया. रोमिला ने कहा कि मैं जेएनयू को अपना सीवी साझा करने की इच्छा नहीं रखती. रोमिला  थापर से सीवी मांगने की खबर आने के  बाद सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गयी.

शिक्षकों और इतिहासकारों के एक वर्ग ने इसका विरोध करते हुए कहा, रोमिला थापर से सीवी की मांग कर जेएनयू प्रशासन उन्हें अपमानित कर रहा है. हालांकि  जेएनयू प्रशासन ने सफाई देते हुए कहा कि कि तय नियमों के तहत ही रोमिला थापर से सीवी मांगने वाला पत्र लिखा गया था.

रोमिला थापर लगभग छह दशकों तक एक शिक्षक और शोधकर्ता रही हैं. उन्हें प्रारंभिक भारतीय इतिहास में विशेषज्ञता प्राप्त है. 1970 से 1991 तक जेएनयू में प्रोफेसर थीं और 1993 में उन्हें प्रोफेसर एमेरिटा चुना गया था.  प्राचीन इतिहास के क्षेत्र में उनका अहम योगदान है.  रोमिला थापर ने  पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ  ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज से एएल बाशम के मार्गदर्शन में 1958 में डॉक्टर की उपाधि ली थी.

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रोमिला थापर केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचक रही हैं

खबरों के अनुसार  जेएनयू के रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने पिछले माह रोमिला थापर को पत्र लिखकर सीवी जमा करने को कहा था. पत्र में लिखा था कि विश्वविद्यालय एक समिति का गठन करेगी,  जो थापर के कामों का आकलन करेगी. जिसके बाद फैसला लिया जायेगा कि वह एमेरिटा प्रोफेसर के तौर पर जारी रहेंगी या नहीं.

जेएनयू विश्वविद्यालय के अनुसार  वह जेएनयू में प्रोफेसर एमेरिटस के पद पर नियुक्ति के लिए अपने नियमों का पालन कर रहा है. नियमों के अनुसार विश्वविद्यालय के लिए यह जरूरी है कि वह उन सभी को पत्र लिखे जो 75 साल की उम्र पार कर चुके हैं ताकि उनकी उपलब्धता और विश्वविद्यालय के साथ उनके संबंध को जारी रखने की उनकी इच्छा का पता चल सके.

पत्र सिर्फ उन प्रोफेसर एमेरिटस को लिखे गये हैं जो इस श्रेणी में आते हैं.  विश्वविद्यालय ने  कहा कि पत्र उनकी सेवा को खत्म करने के लिए नहीं जारी किया गया था.जान लें कि  रोमिला थापर केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचक रही हैं. रोमिला थापर ने इस बात की पुष्टि की कि उन्हें जुलाई में पत्र मिला था और उन्होंने इसका जवाब दिया है, यह जीवन भर का सम्मान है.

राजनीति से प्रेरित कदम

ट्विटर पर जेएनयू से कई यूजर्स सवाल पूछ रहे हैं. एक यूजर से पूछा जेएनयू के नियम के अनुसार 75 साल की उम्र पार कर चुके प्रोफेसर से सीवी मांगा जाता है, लेकिन वर्तमान में रोमिला थापर की उम्र 87 है. ऐसे में सवाल ये है कि जेएनयू ने नियमों का पालन करना कब से शुरू किया है? जेएनयू के एक सीनियर फैकल्टी के अनुसार यह पूरी तरह से एक राजनीति से प्रेरित कदम है.

बता दें कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के चुनिंदा शिक्षाविदों को ही पद के लिए चुना जाता है.जेएनयू में जिस सेंटर से एक प्रोफेसर रिटायर होता है वह एमेरिटस प्रोफेसरों का नाम प्रस्ताव में रखता है. इसके बाद संबंधित बोर्ड ऑफ स्टडीज और विश्विद्यालय के अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद मंजूरी देते हैं.

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