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खरसावां गोलीकांड  : 71 साल बाद भी भरे नहीं जख्म, आजाद भारत का जलियांवाला कांड

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  • सिंहभूम को उड़ीसा में विलय की जारी थी कवायद,  झारखंड आंदोलनकारियों ने दी थी शहादत
  • झारखंड की माटी के पूतों ने झारखंडी अस्मिता को बनाये रखा,  जय झारखंड का नारा भी बुलंद हुआ
  • खरसांवा में मुख्यमंत्री रघुवर दास का एक जनवरी 2017 को पुरजोर विरोध हुआ था
  • कोल्हान में एक जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाया जाता है

PRAVIN KUMAR

RANCHI: जलियावाला बाग कांड के तर्ज पर आजाद भारत में भी जलियावाला बाग कांड हुआ था. यह घटना किसी दूसरे प्रदेश में नहीं बल्कि झारखंड के सिंहभूम में घटी थी. इस कांड के जख्म 71 साल बाद भी भरे नहीं हैं. कारण था, झारखंड की पहचान सिंहभूम को ओड़िशा में मिलाने की कोशिश. लेकिन झारखंड के माटी के पूतों ने अपनी शहादत देकर झारखंड के भौगोलिक क्षेत्र को अक्षुण्ण बनाये रखा. इसी समय जय झारखंड का नारा भी जोरों से बुलंद हुआ था. यह वही जगह है जहां वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास का एक जनवरी 2017 में पुरजोर विरोध हुआ था. सीएम को काला झंडा दिखाया गया था. सीएम बिना सभा किये वापस लौट आये थे. इस घटना के शोक में कोल्हान के लोग आज भी नया साल नहीं मनाते हैं.

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चंद्रपुर में हुई सभा में लिया गया था संकल्प

25 दिसम्बर 1947 को चंद्रपुर जोजोडीह में नदी किनारे एक सभा आयोजित की गयी थी. इसमें तय किया गया कि सिंहभूम को ओड़िशा में न मिलाया जाए. बल्कि यह अलग झारखंड राज्य के रूप में रहे. दूसरी ओर सरायकेला खरसावां के राजाओं ने इसे ओड़िशा राज्य में शामिल करने की सहमति दे दी थी. झारखंडी जनमानस खुद को स्वतंत्र राज्य के रूप में अपनी पहचान कायम रखने के लिए गोलबंद होने लगे. तय किया गया कि एक जनवरी को खरसावां के बाजारताड़ में सभा का आयोजन किया जायेगा. जिसमें जयपाल सिंह मुंडा भी शमिल होंगे. इस रैली व सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने आने की सहमती दी थी. जयपाल सिंह को सुनने के लिए तीन दिन पहले से ही चक्रधरपुर, चाईबासा, जमशेदपुर, खरसवां, सरायकेला के ग्रामीण क्षेत्र के युवा, बच्चे, बूढ़े, नौजवान और महिला पैदल ही सभास्थल की ओर निकल पड़े. अपने साथ सिर पर लकड़ी की गठरी, चावल, खाना बनाने का सामान, डेगची-बर्तन भी साथ में लेकर आये थे.

आजादी के भी गीत गाये गये

एक जनवरी 1948, गुरुवार को हाट-बाजार का भी दिन था. आस-पास की महिलाएं बाजार करने के लिए आयी थीं. दूर-दूर से आये बच्चों एवं पुरुषों के हाथों में पारंपरिक हथियार और तीर-धनुष थे. वहीं रास्ते में सारे लोग नारे लगाते जा रहे थे और आजादी के गीत भी गाये जा रहे थे. एक ओर राजा के निर्णय के खिलाफ पूरा कोल्हान सुलग रहा था,  दूसरी ओर सिंहभूम को ओड़िशा राज्य में मिलाने के लिए, ओड़िशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय पाणी भी अपना षडयंत्र रच चुके थे. ओड़िशा राज्य प्रशासन ने पुलिस को खरसावां भेज दिया. पुलिस चुपचाप मुख्य सड़कों से न होकर अंधेरे में 18 दिसम्बर 1947 को खरसांवा पहुंची. इसमें शस्त्रबलों की तीन कंपनियां थी, जो खरसावां मिडिल स्कूल में जमा हुईं. आजादी के मतवाले इन बातों से बेखबर अपनी तैयारी में लगे थे. सभी ‘जय झारखण्ड  का नारा लगाते हुए जा रहे थे और साथ ही ओड़िशा के मुख्यमंत्री खिलाफ भी नारा लगा रहे थे.

झारखंड आबुव: उड़ीसा जारी कबुव: रोटी पकौड़ी तेल में, विजय पाणी जेल में

झारखंड आबुव: उड़ीसा जारी कबुव: रोटी पकौड़ी तेल में, विजय पाणी जेल में- का नारा बुलंद किया गया. एक जनवरी 1948 की सुबह, राज्य की मुख्य सड़कों से जुलूस निकाला गया. इसके बाद कुछ नेता खरसावां राजा के महल में जाकर उनसे मिले और सिंहभूम की जनता की इच्छा बतायी. इस पर राजा ने कहा कि इस विषय पर भारत सरकार से बातचीत करेंगे. दो बजे दिन से चार बजे तक सभा हुई. सभा के बाद आदिवासी महासभा के नेताओं ने सभी को अपने-अपने घर जाने को कहा. सभी अपने-अपने घर की ओर लौट गये. लेकिन कुछ लोग सभा स्थल पर ही रुक रहे.

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आधे घंटे बाद शुरू हो गयी गोलीबारी

सभा समाप्त होने के आधे घंटे के बाद बिना चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी गयी. आधे घंटे तक गोली चलती रही. गोली चलाने के लिए आधुनिक हथियारों का प्रयोग किया गया. इस गोलीकांड में आदिवासी और मूलवासी कटे पेड़ की तरह गिरने लगे. घर लौटते लोगों पर भी ओड़िशा सरकार के सैनिकों ने गोलियों की बौछार कर दी. इस गोलीकांड से बचने के लिए बहुत से लोग सीधे जमीन पर लेट गए. वहीं लोगों के भाग जाने के बाद भी सैनिकों की ओर से बेरहमी से गोलियां चलायी जाती रहीं. कई लोग जान बचाने के लिए पास के कुआं में भी कूद गये, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गयी.

महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया

महिला-पुरुषों के अलावा बच्चों की पीठ पर भी गोलियां दागी गयीं. यहां तक कि घोड़े, बकरी और गाय भी इस खूनी घटना के शिकार हुए. गोलियां चलने के बाद पूरे मैदान में लाशें बिछ गयी थीं. वहां कई घायल गिरे पड़े थे. लाशों को ओड़िशा सरकार के सैनिक ने चारों ओर से घेर रखा था. सैनिकों ने किसी भी घायल को वहां से बाहर जाने नहीं दिया और न ही घायलों की मदद के लिए किसी को अंदर आने की अनुमति नहीं ही दी गई. घटना के बाद शाम होते ही ओड़िशा सरकार के सैनिकों की ओर से बड़ी ही निर्ममता पूर्वक इस नरसंहार के सबूत को मिटाना शुरू कर दिया गया था.

लाशों को सारंडा के बिहड़ों में फेंक दिया

गोलीबारी के बाद सैनिकों ने शव को एकत्रित किया और 10 ट्रकों में लादकर ले गये. लाशों को सारंडा के बिहड़ों में ले जाकर फेंक दिया गया. वहीं इस घटना में महिला-पुरुष एवं बच्चों का बेरहमी से नरसंहार किया गया. घायलों को सर्दी की रात में पूरी रात खुले में छोड़ दिया गया और उन्हें पानी तक नहीं दिया गया. इसके बाद ओड़िशा सरकार ने बाहरी दुनिया से इस घटना को छिपाने की भरपूर भी कोशिश की. बहादुर उरांव के अनुसार ओड़िशा सरकार नहीं चाहती थी कि इस नरसंहार की खबर को बाहर जाने दें. यहां तक कि बिहार सरकार ने घायलों के उपचार के लिए चिकित्सा दल और सेवा दल भी भेजा, जिसे वापस कर दिया गया. साथ ही पत्रकारों को भी इस जगह पर जाने की अनुमति नहीं थी.

इन माटी के पूतों ने दी शहादत

मतय हेंब्रम,  हरी सरदार,  मानकी पा,  खेरसे पूर्ति,  मड़की सोय, लखन हेंब्रम, धनेश्वर बानरा, कुंबर डांगिल, रघुनाथ पांडया, सुभाष हेंब्रम, बिटू राम सोय, मोराराम हेंब्रम, सूरा बोदरा, बुधराम सांडिल आदि.

क्या कहते हैं पूर्व विधायक बहादुर उरांव

बहादुर उरावं बताते हैं, एक ओर जहां देश और दुनिया में नववर्ष के आगमन पर जश्न मनाया जाता है वहीं  दूसरी ओर खरसावां और कोल्हान के लोग आज भी अपने पूर्वजों की याद में एक जनवरी को काला दिवस और शोक दिवस के रूप में मनाते हैं. बहादुर उरांव कहते हैं- झारखंड की लड़ाई बहुत पुरानी थी, अलग झारखंड की लड़ाई में मैंने अपने दोनों पुत्रों को भी खोया. लेकिन जिस तरीके से राज्य में विधि व्यवस्था चल रही है और झारखंडियों का शोषण हो रहा है, यह पीड़ादायक है. अपनी बात को कहते हुए वे रो पड़े और कहा कि इस तरह के राज्य के लिए हमने संघर्ष नहीं किया था. जहां जनता की इच्छा और आकांक्षा को दरकिनार किया जा रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि खरसावां गोलीकांड आजाद भारत के इतिहास में सबसे निंदनीय एवं दूसरा जलियावाला बाग कांड था. आजाद भारत में पहली बार स्वाधीनता दिवस के 133 दिन बाद, लोकतांत्रिक देश के खरसांवा में कर्फ्यू लगाया गया था.

शहीदों को आज तक नहीं मिला सम्मान  

खरसावां गोलीकांड में मारे गये सभी शहीदों की पहचान आज तक नहीं हो सकी है. गोलीकांड के 71 साल बाद भी शहीदों के परिजनों को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला है. आश्रितों को मुआवजा या नौकरी नहीं मिली. हर साल पहली जनवरी को शहीद स्थल पर जुटनेवाले नेता अपने भाषण में शहीदों को मान-सम्मान दिलाने व परिजनों को मुआवजा व नौकरी देने की घोषणा करते हैं. यही सिलसिला झाऱखंड गठन के 17 साल बाद तक जारी है.

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