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विकास योजना का हाल : गरीब विधवा मुन्नी देवी और उनके बच्चों को एक साल से नसीब नहीं हुई है दाल

भुखमरी के करीब पहुंचे आदिवासी परिवार के हालात खोल रहे विकास योजनाओं की पोल- पहली किस्त

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James Herenj

Latehar : दावे कहते हैं कि राज्य में पिछले दो सालों में भूख और भूख जनित बीमारियों से 19 मौतें हो चुकी हैं. हालांकि, झारखंड सरकार से लेकर पूरा का पूरा सरकारी महकमा इन दावों को नकारता रहा है. जबकि, जमीनी हकीकत बताती है कि राज्य के सुदूर गांवों में आज भी कई आदिवासी परिवार अन्न के अभाव के कारण भुखमरी का दंश झेल रहे हैं. ये आदिवासी परिवार गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे हैं. इन्हें सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है. इनके हालात अधिकारियों की संवेदनशीलता, सरकारी योजना और सरकार के विकास के दावों की हकीकत बयां करते हैं. ये हालात राज्य में खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन के दावे को भी झुठलाते हैं. पढ़िये लातेहार जिला के वैसे परिवारों के हालात पर आधारित न्यूज विंग की ग्राउंड रिपोर्ट की पहली किस्त-

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एक साल पहले एक सप्ताह तक भूखा रहा था मुन्नी देवी का परिवार, आज तक नहीं मिला राशन कार्ड

महुआडांड़ प्रखंड मुख्यालय के पास ही मुन्नी देवी (पति स्व. चुन्नू नगेसिया) अपने तीन बच्चों के साथ एक झोपड़ीनुमा एक कमरे के मकान में रहती हैं. उनका परिवार जहां रहता है, वह उनकी अपनी जमीन नहीं है. वह जमीन किसी और के मकान के पिछवाड़े का हिस्सा है. मुन्नी देवी वहां रहने के एवज में मकान मालिक के घर में काम करती हैं, इसलिए उनसे मकान का किराया नहीं लिया जाता है. मुन्नी देवी के तीन बच्चों में सबसे बड़ा बेटा अनूप नगेसिया (10 वर्ष) है, जो स्थानीय सरकारी विद्यालय में कक्षा दो में पढ़ता है. दूसरा पुत्र अजय नगेसिया (चार वर्ष) और तीसरी बेटी अनुप्रिया (दो वर्ष 6 माह) है. मुन्नी देवी के पति चुन्नू नगेसिया की मौत छह माह पूर्व हो गयी थी. मृत्यु के कारणों के संबंध में मुन्नी देवी ने बताया, “दिसंबर-जनवरी का ही अत्यधिक ठंड का समय था. अत्यधिक ठंड और बुखार के कारण ही उनकी मौत हो गयी थी. मौत से छह माह पूर्व ही वह किसी तरह का काम करने में असमर्थ हो गये थे. बीमारियों के कारण शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो गये थे. मृत्यु के समय ठंड और बुखार से पीड़ित थे. इलाज के लिए उन्हें सरकारी अस्पताल ले गये थे. वह काफी कमजोर हो गये थे. अस्पताल में जांच हुई थी. सरकारी कर्मियों द्वारा बताया गया था कि बड़ा वाला मलेरिया है. घर में ही दवाई ले रहे थे, लेकिन दवाई भी खत्म हो गयी थी. वह शारीरिक कमजोरी के कारण चलने में असमर्थ थे. इस कारण बाद में उन्हें अस्पताल नहीं ले जा सके. दवाई खत्म होने के तीन दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी. उनके जीवित रहते भर में उनका किसी तरह का राशन कार्ड नहीं था और न ही मनरेगा रोजगार कार्ड. मतदाता पहचानपत्र और आधार कार्ड था. मेरे पति घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे.” बता दें कि पिछले साल जब मुन्नी देवी का परिवार एक सप्ताह तक भूखा था, तब इसकी खबर मीडिया में आयी थी. मीडिया में खबर आने के बाद से इस परिवार को 20 किलोग्राम राशन मिल रहा है, लेकिन इस परिवार को आज तक राशन कार्ड नहीं मिला है. आलम यह है कि पिछले एक साल से इस परिवार को दाल नसीब नहीं हुई है.

विधवा पेंशन से भी वंचित हैं मुन्नी देवी

पति की मृत्यु के बाद भी मुन्नी देवी को राष्ट्रीय पारिवारिक योजना का लाभ नहीं मिल पाया, क्योंकि उनके आवेदन के लिए जाति प्रमाणपत्र, स्थानीय प्रमाणपत्र और बीपीएल नंबर मांगा जा रहा था. विधवा पेंशन के लिए फरवरी एवं दिसंबर 2018 में अंचलाधिकारी के पास आवेदन जमा है. इसके बाद भी अधिकारियों की असंवेदनशीलता के कारण पेंशन का लाभ भी मुन्नी देवी को नहीं मिल रहा है.

गर्भावस्था में भी दूसरे के घर में काम कर परिवार का करती रहीं गुजारा

मृत्यु के छह माह पूर्व जब मुन्नी देवी के पति चुन्नू नगेसिया ने शारीरिक कमजोरी के कारण मेहनत-मजदूरी करना बंद कर दिया था, तब उन दिनों में मुन्नी देवी गर्भवती होने के बावजूद दूसरों के घरों में बर्तन साफ कर और दूसरे घरेलू काम कर किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही थीं. काम के बदले कोई मजदूरी निर्धारित नहीं थी. वह जिनके घरों में काम करती थी, वे लोग उन्हें हमेशा ही बासी भात, यानी रात का खाना सुबह और सुबह का खाना शाम को मजदूरी के रूप में देते थे. मुन्नी देवी उसी खाना को अपने बच्चों और बीमार पति को खिलाती थी. पिछले वर्ष उसकी भी तबीयत काफी खराब हो गयी थी, उस दौरान एक सप्ताह तक बच्चों समेत उनका पूरा परिवार भूखा ही रहता था.

राशन कार्ड बनाने का दिया आवेदन, फिर भी नहीं बना कार्ड

राशन कार्ड बनवाने के लिए मुन्नी देवी ने स्थानीय राशन डीलर बिजू एवं अशोक के पास अलग-अलग दो बार आवेदन जमा किया था. उन्होंने प्रखंड के एमओ के पास भी अपनी समस्या को कई बार रखा था. लेकिन, एमओ ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि राशन कार्ड बनवाने का कोई विकल्प नहीं है.

आर्थिक तंगी झेल रही मुन्नी देवी का ऐसे होता है गुजर-बसर

मुन्नी देवी के घर से आंगनबाड़ी केंद्र की दूरी लगभग 400 मीटर है. वहां भी उन्होंने बताया कि यातायात और भीड़-भाड़वाला क्षेत्र होने के कारण बच्चे आंगनबाड़ी केंद्र तक नहीं जा पाते हैं. बेटा अजय को वहां तक पहुंचा देने के बाद ही आंगनबाड़ी में खाना खा पाते हैं. फिलहाल पिछले छह माह से वहां भी पोषाहार बंद है. मुन्नी देवी के कथनानुसार आंगनबाड़ी सेविका ने कहा कि उनलोगों का वेतन बंद है, इस कारण उनलोगों ने पोषाहार भी बांटना बंद कर दिया है. जब केंद्र से पैकेट मिलता था, तब भी सेविका चार पैकेट के बजाय तीन पैकेट ही वितरण करती थी, जिसे परिवार के सभी सदस्य सुबह और शाम को बनाकर चार से पांच दिन उसी से गुजारा करते थे. मुन्नी देवी वर्तमान में दूसरों के घरों में घरेलू काम करके अपने तीन बच्चों का लालन-पालन कर रही हैं. उनकी औसत आमदनी 30 रुपये प्रतिदिन है. उसके पास मतदाता पहचानपत्र, आधार कार्ड, बैंक पासबुक है. उन्होंने काफी जद्दोजहद कर उज्ज्वला गैस कनेक्शन प्राप्त कर लिया है. उनके पास रोजगार कार्ड नहीं है. उन्हें हमेशा डर सताता रहता है कि कहीं उन्हें कुछ हो गया, तो उनके तीनों बच्चों का क्या होगा.

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