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वनोत्पाद से कॉस्मेटिक बना शिखा ने बनाई नई पहचान, ग्रामीण महिलाओं को भी किया सशक्त

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  • हुरलुंग गांव की महिलाओं के साथ मिलकर बनाती हैं हर्बल उत्पाद
  • जंगलों से लाती हैं सामान
  • 2008 से कर रही इस क्षेत्र में काम

Chhaya

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Ranchi: जल, जंगल, जमीन की लड़ाई हर ओर चल रही है. लोग इसे बचाना तो चाहते है. लेकिन आधुनिक संसाधनों के साथ इसका उपयोग कैसे किया जाएं इसके बारे में शायद ही कोई सोचता है. कुछ ऐसे ही वनोत्पादों से हर्बल उत्पाद बना रही हैं शिखा जैन. जिनकी नींव नामक फैक्टरी जमशेदपुर के हुरलुंग गांव में है. 2008 से शिखा ने अपने काम की शुरुआत की. दो महिलाओं के साथ साबून, परफ्यूम, अलग-अलग तरह के तेल, सिंदूर, काजल समेत अन्य सौंदर्य प्रसाधन बनाने की जो शुरुआत शिखा ने की. आज वहीं काम हुरलुंग गांव की महिलाओं की पहचान बन चुका है. ये काम आज ना सिर्फ इस गांव की महिलाओं को रोजगार दिला रहा है. बल्कि गांव के बच्चों को ये अपने स्कूल में मुफ्त शिक्षा भी देती हैं. शिखा ने बताया कि उनके काम में उनके पति अनुराग जैन का भी भरपूर सहयोग है.

जंगलों से लाती हैं समान

वनोत्पादों से बनने वाले इन सौदर्यं प्रसाधनों समेत, साबून और तेल बनाने के लिए शिखा गांव की महिलाओं के साथ जंगल जाती हैं. शिखा ने बताया कि हुरलुंग गांव के आसपास काफी जंगल है. ऐसे में सिंदूर बनाने के लिए, अलग अलग साबून, क्लींजर, टोनर समेत अन्य सामान बनाने के लिए यहां काफी सामान मिल जाते हैं.

खुद का फॉर्म हाउस भी है

जंगलों से समान लाने के साथ शिखा गांव में ही 10,000 स्केवयर फुट जमीन में खुद की फार्मिंग भी करती हैं. जिसमें इन्हें ग्रामीणों का भी सहयोग मिलता है. इसमें इन्होंने खीरा, आवंला, भृंगराज, मेंहदी, गुलाब, एलोवेरा, नीम, तुलसी, बरहेड़ा समेत अलग-अलग तरह के औषधीय पौधों को लगाया है. इसके साथ ही खीरा, पपीता, महुआ, जामुन के पेड़ भी इन्होंने लगाएं हैं. शिखा ने बताया कि उत्पाद बनाने के लिए नारियल का तेल केरला से मंगाया जाता है. जो वहां से किसानों से ये सीधे खरीदती हैं. वहीं हिमाचल प्रदेश से खुशबू के लिए अलग-अलग तेल मंगाया जाता है.

गांव वालों ने किया था विरोध

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अपनी काम से आज पहचान बना चुकी शिखा ने बताया कि शुरुआत में महिलाओं को इस काम से जोड़ना काफी आसान था. 2008 के बाद से लगातार महिलाएं काम से जुड़ती गई. महिलाओं के बनाएं उत्पाद की मांग को देखते हुए शिखा और उनके पति ने गांव में ही एक फैक्टरी खोलने की सोची. जब उन्होंने फैक्टरी का काम शुरू किया तो गांव वालों ने इसका काफी विरोध किया. उन्होंने बताया कि हुरलुंग में मुख्यता सोरेन, मुंडा, गोप और महतो लोग निवासी करते हैं. ऐसे में इन्हें ये पसंद नहीं था कि कोई बाहरी लोग यहां बसे. इस दौरान कभी पानी, कभी बिजली जैसी समस्या का सामना शिखा को करना पड़ा. लेकिन अपनी मेहनत के बल पर इन्होंने गांव में फैक्टरी बनाई और अब गांव वाले भी इनके काम में इनका सहयोग करते हैं. इस गांव में लगभग 150 घर है.

जुड़ी हैं 50 महिलाएं

2008 से शिखा ने बहुत सी महिलाओं को अपने साथ काम सीखाया और रोजगार मुहैया कराया. जिसमें लगभग 200 महिलाएं हैं जिन्होंने इनसे काम सीखा हो. वर्तमान में इनके साथ 50 महिलाएं मिलकर काम कर रही हैं.

विदेशों में है मांग

इनके बनाएं सामानों की न सिर्फ देश के 150 दुकानों से ऑर्डर आते हैं. बल्कि विदेशों में भी इसकी खुब मांग है. शिखा ने बताया कि इनके बनाएं उत्पादों की मांग ब्राजील, सिंगापुर, अमेरिका, जापान में है. इन देशों से इनके पास हमेशा ऑर्डर आते हैं.

प्रकृति संरक्षण के साथ काम करने की थी इच्छा

शिखा ने बताया कि इन्होंने कई स्तरों पर ऐसे कामों का प्रशिक्षण लिया है. उन्होंने कहा कि पर्यावरण को सभी बचाना चाहते हैं. लेकिन इसके उपयोग पर अगर बल दिया जाएं तो पर्यावरण खुद ब खुद सरंक्षित होगा. इसलिए वनोत्पादों के साथ काम करने लगी. उन्होंने बताया कि अच्छा लगता है जब जंगलों से सामान लाकर अलग-अलग चीजें बनाते हैं और लोग उसे पसंद करते हैं. प्रकृति को बचाने का ये एक सरल तरीका है. इससे लोग इनका महत्व भी समझ पाएंगे.

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