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वामपंथी दलों के वोटर का उनसे दूर जाना देश का विभाजन की दिशा में बढ़ने जैसा है

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Faisal Anurag

यह एक गंभीर मसला है कि किसी भी पार्टी का कैडर और समर्थक उससे पाला छुड़ाकर बिल्कुल विपरीत ध्रुव की राजनीति के साथ क्यों चलने लगता है. पश्चिम बंगाल और झारखंड में वामपंथी दलों के वोटर का उनसे इस तरह छिटक जाना कोई सामान्य बात नहीं है. चुनाव में बुरी तरह हार जाने के बाद भी न तो किसी राजनीतिक दल की मृत्यु की घोषणा करना ही न्यायसंगत है ओर न ही उसके फिर से उठ खड़े होने की संभावना को ही समाप्त मान लेना.

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लेकिन कैडर और कार समर्थक का बिछड़ना इससे अलग एक गंभीर मामला है. इसके बावजूद ऐसा नहीं लगता है कि वामपंथ के किसी भी धड़े का नेतृत्व इस परिघटना का वस्तुगत विश्लेषण कर पाया है. तीनों बड़ी वामपंथी पार्टियों का नेतृत्व सवालों के घेरे में है. लेकिन न तो किसी ने भी बढ़कर पराजय की जिम्मेवार ली है और न ही भविष्य के लिए कोई उम्मीद पैदा कर पाये हैं.

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पूरे देश में वामपंथ अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और इसकी पूरी जिम्मेदारी पार्टियों की आंतरिक संरचना और नेतृत्व की अक्षमता को ही रेखांकित करता है. वैचारिक रूप से तो उनके कमजोर होने का  सिलसिला कई सालों से दिख रहा था लेकिन इस कारण पार्टियां इस तरह लचर हो गयीं हैं, इसकी पहली झलक 2014 में मिली थी.

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त्रिपुरा के चुनाव में उनका वह तेवर भी गायब था जो अपने ईमानदार मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के जनपक्षीय नीतियों से किसी भी विपरीत धारा का मुकाबला करता दिखे थे. त्रिपुरा के पहले बंगाल से ही यह संकेत मिलना प्रारंभ हो गया था कि तीनों पार्टियों के भीतर गंभीर किस्म का संकट है और  इस संकट को पहचानने का तरीका पार्टियां खोज नहीं पा रही हैं.

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बंगाल में तो बड़ी पराजय के बाद भी न तो केंद्र ओर राज्य का नेतृत्व बदला और न ही जमीनी संघर्ष का तेवर वामफ्रंट ने दिखाया. इसके साथ ही देशभर के इस नरेटिव को भी वामपंथी दलों ने गंभीरता से नहीं लिया कि संसद में वामपंथ की मजबूत उपस्थिति गरीब, किसान और मजदूर के हित की गारंटी है. लेकिन यह भूमिका वामपंथी दल लगातार खोते जा रहे हैं. वे एक सी राजनीतिक ताकत बन कर रह गये हैं, जो जेएनयू जैसे संस्थानों से बाहर कोई बड़ी भूमिका निभाते नहीं दिख रहे हैं.

वामपंथ की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह लगातार मजदूर और किसान फ्रंट पर भी सिकुड़ता गया है और उसने सत्ता पाने के दावे को न जाने कब से छोड़ दिया है. वामपंथ एक ऐसे समूह के रूप में उभरा है जिसमें न तो क्षेत्रीय पकड़ वाले नेता दिखते हैं और विचारों की ऊर्जा. यह तो पहले ही से छीजती चली गयी है. कैडर और कोर समर्थकों का इस तरह बिखर जाना मामूली बात नहीं हैं. केरल की हार तो असामान्य नहीं है क्योंकि केरल में बदलाव लगभग हर चुनाव की परिघटना है. लेकिन अन्य राज्यों से खाता भी न खुलना बेहद गंभीर बीमारी के संकेत हैं.

इस बीमारी को बढ़ने और विकसित होने का अवसर भी इन पार्टियों की आंतरिक संरचना और विचारों की दरिद्रता में अंतरनिहित है.

वामपंथी दलों ने उन नये बदलावों के संदर्भ को नकार दिया है जो तकनीक ने संभव किया है ओर जिसने नागरिकों के नये किस्म के मनोविज्ञान सृजन किया है. बहस यह नहीं है कि यह मनोविज्ञान नकारात्मक है या सकारातमक. सवाल यह है कि इसके अनुकूल अपनी नीतियों और रणनीति को धार देने में नाकामी मिली है. संजीदा मामला तो यह भी है कि नेतृत्व इससे बेखर-सा दिखता है. यह तो मान ही लेना चाहिए कि इस नये  वातावरण के विश्लेषण के लिए नया तेवर, नजरिया और दक्षता जरूरी है. ताकि बुनियादी दार्शनिक राजनीति के अनुकूल उसकी व्याख्या प्रस्तुत की की जा सके.

पहले तो जाति के सवाल को जिस तरह से नजरअंदाज करने का रवैया अपनाया गया और बाद में आये सामाजिक उभार में स्वयं की प्रासंगिकता को बनाये रखने की नाकमयाबी भी भारी साबित हो रही है. वामपंथ का मर्सिया तो नहीं पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वामपंथ के उभार के सारे संदर्भ और हालात मौजूद हैं. लेकिन इस उभार को गति देने के लिए कार्यक्रम और नेतृत्व के स्तर पर बड़े पैमाने पर बदलाव की भी जरूरत है.

झारखंड में भी वापंथ की वही त्रासदी है जो बंगाल में दिख रही है. इसमें सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले भी शामिल हैं. आखिर आत्म मूल्यांकन करने का साहस ये दल कब तक दिखा पायेंगे. पिछले पांच सालों में किसानों ओर मजदूरों के आंदोलनों को बड़े पैमाने पर संगठित करने के बावजूद राजनीतिक तौर पर उनकी नाकामयाबी को इस संदर्भ में गंभीरता से देखा जाना चाहिए.

इस त्रासदी को समझने के लिए मशहूल इतिहासकार  प्रो विपिनचंद्र की एक बातचीत का हिस्सा यहां प्रस्तुत है. इसे आलोक बाजपेयी ने लिखा है. ‘‘ मैंने पूछा – अगर कभी भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आयी तो आप देश का क्या भविष्य देखते हैं?

विपिन ने जवाब दिया – मेरा सोचना है कि अगर भाजपा इस देश मे 10-15 साल तक बहुमत के साथ सरकार चलायेगी तो देश के टुकड़ें हो जायेंगे. और बाहरी साम्राज्यवादी देश उसी तरह से भारत पर शिकंजा कस लेंगे जैसे अन्य धार्मिक कट्टरपंथी देशों में उन्होंने कर लिया है.

I will not be alive to see this disaster but may happen in your life time.

मैंने उनकी बात काटी और कहा कि देश बहुत बड़ा है और यहां जर्मनी जैसे हालात नहीं हो सकते, फिर इतनी विविधता भी है.

उन्होंने कहा – ये लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद कर देंगे. ये क्षेत्रीय पार्टियां इनके खिलाफ लड़ नहीं पायेंगी. कांग्रेस में मक्कार लोगों की भरमार है. बंगाल में कम्युनिस्ट कैडर इनके साथ चला जायेगा.

मैंने आश्चर्य किया – कम्युनिस्ट कभी साम्प्रदायिक नहीं हो सकता.

वो हंसे बोले- मुझसे ज्यादा तुम कम्युनिस्ट पार्टियों को नही जानते. साम्प्रदायिकता पर इनकी समझ बहुत ही ऊपरी है. कांग्रेस विरोध इनमें इतना भीतर तक है कि ये कुछ भी कर सकते हैं.

मैंने कहा कि आप भारत मे कम्युनिस्ट पार्टियों का क्या भविष्य देखते हैं.

विपिन ने जवाब दिया – अब इनका पार्टी के रूप में भविष्य खत्म ही है क्योंकि इनमें वैचारिक ईमानदारी की घोर कमी हो गयी है और ये लंबे समय से self destructive path पर हैं. मैं तो थक गया समझाते समझाते.

फिर बोले- भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का शानदार इतिहास रहा है. लेकिन ये स्टालिनवाद से अलग न हो पाये. एक और लोकतांत्रिक ढांचे को अडॉप्ट नहीं कर पाये.

एक बार 1980 के दशक  दौरान मैंने कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास पर लिखने का मन बनाया. बहुत मटेरियल इकठ्ठा किया. फिर लगा कि क्या फायदा. जिनके लिए लिखूंगा वो तो पढ़ेंगे नहीं, दूसरे मजे लेंगे. तो आईडिया ड्राप कर दिया.

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