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#Nobellaureate अभिजीत बनर्जी ने कहा,  राष्ट्रवाद गरीबी जैसे मुद्दों से ध्यान भटका देता है…

अपने इंटरव्यू में अभिजीत बनर्जी ने गरीबी को लेकर चिंता जताते हुए बताया कि कैसे जेएनयू  के दिनों ने उन्हें भारतीय राजनीति को गहराई से समझने में मदद की.

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NewDelhi : राष्ट्रवाद खासकर भारत जैसे देशों में गरीबी सरीखे बड़े मुद्दों से ध्यान भटका देता है. यह विचार भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री  Nobel Prize विजेता अभिजीत बनर्जी के हैं.  Esther Duflo व Michael Kremer के साथ इकनॉमिक्स में 2019 का नोबल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत विनायक बनर्जी ने इंडिया टुडे टीवी को दिये इंटरव्यू में कहा कि राष्ट्रवाद खासकर भारत जैसे देशों में गरीबी सरीखे बड़े मुद्दों से ध्यान भटका देता है.

उन्होंने यह भी कहा देश में न्यूनतम आय गारंटी योजना की सख्त जरूरत है. राजनीतिक गलियारों में अभिजीत की टिप्पणी को एक तरह से मोदी सरकार पर निशाना माना जा रहा है

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 जेएनयू में भारतीय राजनीति को गहराई से समझने में मदद मिली

अपने इंटरव्यू में अभिजीत बनर्जी ने गरीबी को लेकर चिंता जताते हुए बताया कि कैसे जेएनयू  के दिनों ने उन्हें भारतीय राजनीति को गहराई से समझने में मदद की.  अभिजीत ने  बातचीत के दौरान सहकर्मी और पत्नी Esther के साथ रिलेशनशिप और उनके भारतीय व्यंजनों के साथ बंगाली नोबेल कनेक्शन के बारे में भी जानकारी दी.

अपने भारतीय  होने के बारे में  अभिजीत बनर्जी ने कहा, मैं बहुत हद तक भारतीय हूं. मैं जब अपना देश कहता हूं, तो उसका मतलब हमेशा भारत से होता है. ऐसे में मेरे लिए कोई और विकल्प नहीं है. मैं खुद को भारतीयों की नजर से देखता हूं.

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जेएनयू और तिहाड़ कांड के बारे में अभिजीत ने अपने अनुभव सुनाये.  उन दिनों ने मुझे यह बताया कि राजनीति की क्या अहमियत है. जेएनयू मेरे लिए बहुत मायने रखता है. मैं कोलकाता से वहां गया था, जहां लेफ्ट वाली राजनीति थी. मुझे उसके अलावा बाकी राजनीति के बारे में कुछ नहीं पता था. इसलिए लोहियावादी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मुझे गांधीवाद, संघ के बारे में जानने को मिला.

हमें मिनिमम इनकम पर विचार करना चाहिए

न्यूनतम आय के संबंध में कहा- हमें मिनिमम इनकम पर विचार करना चाहिए, क्योंकि ढेर सारे लोग हैं, जो बड़े स्तर पर जोखिमों का सामना कर रहे हैं. उनके (किसान) जीवन में कभी ढेर सारी बारिश चीजें बर्बाद कर देती है, जबकि कभी कम बरसात से वे परेशान रहते हैं. कभी-कभार कुछ बैंक भी संकट की स्थिति पैदा कर देते हैं और इमारतों का निर्माण भी रुक जाता है. यही वजह है कि ढेर सारे लोग नौकरियां भी गंवा देते हैं. इन सभी जोखिमों की खाई को किसी तरह पाटना होगा.

अभिजीत बनर्जी से पूछा गया कि बंगाली और नोबेल के बीच क्या फर्क है, रवींद्रनाथ टैगोर, अमृत्य सेन और अब आप को नोबेल मिला?  अभिजीत ने जवाब दिया, मैं इस बारे में अधिक नहीं जानता, पर मुझे मेरे संबंध साफगोई से रखने दें. मैं आधा बंगाली और आधा मराठी हूं.

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