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आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से ध्यान हटाने के लिए NRC को दी जा रही हवा

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Girish Malviya

बीजेपी समाज में साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति के अगले चरण पर आ गयी हैं. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने प्रदेश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ (NRC) का ऐलान कर दिया है। असम की तर्ज पर यहां पर अब नागरिक रजिस्टर वाला नियम लागू किया जाएगा…

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आज देश का सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक मंदी है, बेरोजगारी है…लेकिन किसी भी तरह से इन ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाना है इसलिए NRC के मुद्दे को हवा दी जा रही है….

एनआरसी का मतलब है नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स, यानी नागरिकों की राष्ट्रीय सूची। वो सूची जिसमें भारत के निवासियों का नाम है, जिन लोगों का नाम इस सूची में नहीं होगा, वो भारत के नागरिक नहीं कहलाये जाएंगे…

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देश में सबसे पहले इसे असम में लागू किया गया. असम एक ऐसा राज्य रहा है, जहां हमेशा से यह माना जाता रहा है कि वहाँ बड़ी संख्या में बांग्लादेशी आकर बस गए हैं, असम एक सीमांत राज्य है और इसलिए असम के निकटतम होने के चलते वे यहां बस गए. इसका एक बड़ा कारण बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन की परिस्थितियां रहीं.

लेकिन आसाम की भी जब फाइनल सूची जारी हुई, तब भी असम के वित्त मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के आँकड़ों पर हम पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहे। ये आँकड़ा 19 लाख से ज्यादा होना चाहिए। हमें लगा था कि दोबारा वैरिफिकेशन होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ…

यानी बीजेपी और आरएसएस को खुद NRC के वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है, इसके बावजूद वह असम के नागरिकों की पहचान करने वाले एनआरसी की तरह पूरे देश में इसे लागू करने की बात कर रही है..…गृहमंत्री अमित शाह लोकसभा के चुनाव प्रचार में भी ये कह चुके हैं कि पूरे देश में एनआरसी लागू होगा और देश में गैरकानूनी तरीके से रह रहे बाहरी लोगों को निकाला जाएगा….

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मनोहर लाल खट्टर जैसे बीजेपी के नेताओं के बयानों से साफ है कि पार्टी इसे सिर्फ असम तक ही सीमित रखना नहीं चाहती. पहले कहा गया कि एनआरसी बंगाल में भी लागू होगा. फिर अन्य राज्यों के बीजेपी नेताओं के बयान सामने आने लगे.

महाराष्ट्र में भी बीजेपी की राज्य सरकार ने नवी मुंबई के योजना प्राधिकरण को एक पत्र लिखकर जमीन मांगी है, जिसपर कि अवैध प्रवासियों के लिए हिरासत केंद्र बनाए जाएंगे। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया, जब असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) की अंतिम सूची प्रकाशित हुए 15 दिन भी नहीं बीते थे.

यानी साफ है कि जिस भी राज्य में चुनाव निकट हैं, वहां यह मुद्दा उठाया जा रहा है और देश में जिस तरह की आर्थिक परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं, उससे सम्भव है कि जल्द ही इसे पूरे देश मे लागू कर दिया जाए….

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(लेखक आर्थिक मामलों के सलाहकार हैं,ये इनके निजी विचार हैं)

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