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सिंदरी विधानसभा में बढ़ी बेरोजगारों की संख्या, लोगों का एक ही सवाल- आखिर सिंदरी कब बनेगी सुंदरी?

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Dhanbad : एक समय था जब सिंदरी को कौन नहीं जानता था. देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग सिंदरी का नाम लेते थे. लेकिन सिंदरी की वह पुरानी पहचान अब खत्म हो चुकी है.

अब सिंदरी एक बार फिर से अपनी नयी पहचान बनाने के लिए तैयार हो रही है. जब सिंदरी में एफसीआइ को बंद किया गया था, तो करीब दस लाख लोग बेरोजगार हुए थे.

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फैक्ट्री बंद होने के बाद बेरोजगारी का यह आंकड़ा बढ़ता ही गया. अब स्थिति ऐसी है कि सिंदरी विधानसभा के लगभग हर घर में एक या दो बेरोजगार युवक बैठा हुआ है.

किसी ने आइआइटी किया है तो कोई बेहतर नौकरी की उम्मीद लेकर पोलिटेक्निक की डिग्री लेकर घर बैठा हुआ है. नौकरी किसी को नहीं मिल रही है. जो अधिक जरूरतमंद है वह कोलकाता, दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में पलायन करने को मजबूर है.

पढ़-लिखकर क्या पकौड़े तलेगा बच्चा?

बलियापुर की किर्तिया देवी कहती हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर घर बैठे हुए हैं. नौकरी की तलाश कर रहे हैं लेकिन नौकरी नहीं मिल रही है. अब हमारा बच्चा पढ़-लिखकर क्या करेगा? क्या पकौड़े तलेगा? और अगर पकौड़े ही तलना था तो पढ़ाने-लिखाने का क्या मतलब? किर्तिया देवी कहती हैं कि उनके गांव में बिजली-पानी की भी समस्या है लेकिन इन समस्याओं पर भारी है बेरोजगारी की समस्या. वे पूछती हैं कि क्या इस चुनाव के बाद उनके बच्चों की समस्या दूर होगी?

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रोजगार सृजन के लिए नहीं हुई कोई खास पहल

एफसीसीआइ में कभी शिफ्ट इंचार्ज शिवेंद्र प्रसाद कहते हैं कि जब फैक्ट्री को बंद किया गया था तब इसका प्रतिदिन का उत्पादन एक हजार टन हुआ करते था. बावजूद कंपनी को घाटे में दिखाकर इसे बंद कर दिया गया. दस हजार लोग सड़कों पर आ गये.

2002 में जब फैक्ट्री बंद की गयी तब से यहां बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है. अब तो सिंदरी विधानसभा क्षेत्र में बेरोजगारों की एक लंबी फौज खड़ी हो गयी है. बेरोजगारों को रोजगार देने की दिशा में अभी तक कोई सार्थक पहल नहीं की गयी है.

गांवों में विकट है पेयजल की समस्या, खेतों को भी नहीं मिल रहा पानी

फिरोज आलम, हमीद अंसारी, किर्तिया देवी, गणेश धीवर का कहना है कि सिंदरी विधानसभा के गांवों में बेरोजगारी के बाद अगर दूसरी सबसे बड़ी समस्या है पानी की.

इन लोगों का कहना है कि गांवों में गंभीर पेयजल संकट है. पूरे गांव में एक या दो चापाकल होते हैं, उसी से सबको अपनी प्यास बुझानी पड़ती है. गांवों में पेयजलापूर्ति का काम अभी तक धरातल पर नहीं उतरा है.

जो खेती कर रहे हैं उन्हें विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. जब लोगों को पीने का पानी ही सही ढंग से नहीं मिल रहा है तो खेतों तक पानी कैसे पहुंचेगा.

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हर्ल पर लगता रहा है नौकरी में स्थानीय लोगों की उपेक्षा करने का आरोप

सिंदरी में जब एफसीसीआइ चालू था तो सिंदरी टाउनशिप की आबादी लगभग डेढ़ से दो लाख के बीच थी. अब यह आबादी सिमटकर एक लाख पर पहुंच गयी है. कहते हैं कि जो एक बार सिंदरी आता था, वो यहां से जाना नहीं चाहता था.

पहले एफसीसीआइ से बिजली और पानी मुफ्त मिला करता था. अब ऐसी बात नहीं रही. पानी एफसीसीआइ की मेहरबानी से मिल रहा तो घरों में बिजली झारखंड सरकार की जल रही है. लोगों को अब इसका पैसा देना पड़ रहा है.

हालांकि यहां पर हर्ल का काम जोर-शोर से चल रहा है. सिंदरी के लोग फिर से उम्मीद पाले हुए हैं कि हर्ल के बनने से सिंदरी के दिन फिर से बहुरेंगे और सिंदरी सुंदरी बन सकेगी. लेकिन लोगों की कुछ आशंकाएं भी हैं, जो विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है.

हर्ल पर शुरुआत से ही स्थानीय लोगों की उपेक्षा कर बाहरी लोगों को रोजगार देने का आरोप लगता रहा है. स्थानीय लोग चाहते हैं कि हर्ल में उनकी भागीदारी 70 प्रतिशत हो. मासस जहां इस मुद्दे को लेकर आगे बढ़ रही है, वहीं यह मुद्दा भाजपा प्रत्याशी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है.

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स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति भी बदतर

सिंदरी चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष दीपक कुमार दीपू, व्यवसायी दिलीप कुमार रिटोलिया और अरुण कुमार झा कहते हैं कि सिंदरी के बीआइटी का बड़ा नाम है.

यहां से पढ़कर निकले लोग देश-विदेश में नाम रोशन कर रहे हैं. लेकिन सिंदरी में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा के लिए कोई बेहतर व्यवस्था नहीं है.

अलबत्ता सिंदरी शहर में कई प्राइवेट स्कूल हैं लेकिन सिंदरी टाउनशिप को छोड़कर गांव और देहात के लोगों के लिए अभी भी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना एक सपना देखने जैसा ही है.

स्वास्थ्य सुविधा की स्थिति भी बदतर ही है. सिंदरी और बलियापुर में एक भी ढंग का अस्पताल नहीं है. लोगों को कुछ भी होता है तो उनके पास धनबाद जाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता है.

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