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राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के सवाल पर चुनाव लड़ने के नुकसान की अनदेखी चिंता का विषय

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Faisal Anurag

फिर बैताल डाल पर. इस मुहावरे का खूब इस्तेमाल भी होता है. 1990 के बाद से भारत के चुनाव प्रचारों को देखा जाये, तो सांप्रदायिकता का उसमें पूरी मुखरता से उबरने का अहसास होता है. हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव अभियान में भाजपा और शिवसेना इस एजेंडे को लेकर सक्रिय हो गयी हैं.

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नवंबर-दिसंबर में झारखंड के चुनाव अभियान में भी इसी का बोलबाला रहेगा, इसकी पूरी संभावना है. रोजगार, किसानों की समस्या, देश के आर्थिक हालात जैसे सवाल जिन्हें चुनावों में निर्णायक होना चाहिए, उसे चर्चा से बाहर करने में मीडिया की सक्रिय भूमिका भी शामिल है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित भाजपा के तमाम नेताओं का फोकस इसी पर है. यहां तक कि पीएमसी बैंक के संकट को भी चुनावी चर्चा से बाहर करने में इस तरह की गोलबंदी कारगर हो रही है. 2019 के ही लोकसभा चुनाव भी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के सवाल पर ही लड़ा गया. 1990 के पहले के चुनावों में इस तरह की बातें अपवाद थीं.

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यदि कोई सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बात करता भी था, तो उसकी निंदा की जाती थी. आजादी के बाद के लगभग सभी चुनावों में इस तरह की बातें करने वालों को जनता खारिज कर देती थी. लेकिन 1990 के बाद का राजनीतिक संदर्भ इसी एजेंडे के इर्दगिर्द बनता गया है.

आमजन के निर्णय की प्रवृति को किसी भी तरह के ध्रुवीकरण की प्रक्रिया नुकसान पहुंचाती है. इसका गहरा और दूरगामी असर होता है. आर्थिक प्रगति के सवाल को भी इससे अलग कर नहीं देखा जा सकता है.

किसी भी समाज को दीर्घकाल तक तनाव में रखने का असर जनसमुदाय की चेतना पर होता है. राजनीतिक बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की परंपराओं और संविधान की मान्यताओं से परे धकेलने के अपने खतरे हैं. दुनिया के अनेक देशों के लोकतंत्र को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है.

और अनुभव से सीख लेते हुए इसके दायरे से वे अपने डिस्कोर्स को बाहर कर चुके हैं. दक्षिण एशिया के देशों की त्रासदी है कि वे अतीतवाद से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. बड़ी आर्थिक ताकत बनने के सपने को इससे मदद तो नहीं ही मिल सकती है. साथ ही देश की कार्य दक्षता की उत्पादकता भी इससे प्रभावित होती है.

संविधान बनने के बाद अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि संविधान चाहे जितना प्रगतिशील और अच्छा हो, उसकी कामयाबी उसके लागू करने वालों पर ही होती है. उनकी चिंता यह थी कि यदि भारत के सामाजिक लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया में सामाजिक आर्थिक समानता के पहलू को नजरअंदाज किया जायेगा, तो संविधान की कामयाबी पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा.

अंबेडकर उन प्रवृतियों को गहराई से समझते थे, जो सामाजिक और धार्मिक विद्वेष और भेदभाव को बनाये रखना चाहते हैं. इस प्रवृति को वे लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक मानते थे.

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लंबी प्रक्रिया में यदि यूरोप अमेरिका का लोकतंत्र एक मुकाम हासिल करने में कारगर हुआ है तो उसमें उन संघर्षों का भी योगदान है, जिन्होंने सामाजिक विषमता के खिलाफ संघर्ष किया है. सवाल रंगभेद का हो या धर्म के आधार पर भेदभाव का इन देशों की बहुसंख्यक जनता ने उसे नकारा है.

जर्मनी, इटली और स्पेन की फांसीवादी नाजी प्रवृतियों के कारण हुई तबाही से सीख हासिल करते हुए इन देशों ने राष्ट्रीयता के मानदंड को भी बदला है. इन देशों में अब भी उभरती नाजी प्रवृतियों के विरोध में कड़ा स्वर उठ खड़ा होता है.

फॉर राइट जैसे विचारों को मुख्यधारा से बाहर बने रहना बताता है कि इन देशों के लोकतंत्र ने आत्मसात करने की प्रक्रिया को जीवंत बना रखा है. समावेशी समाज ही आर्थिक विकास और उन्नति की गारंटी दे सकता है. इस सवाल पर दुनिया के तमाम विशेषज्ञ सहमत हैं.

इसके बरअक्स दक्षिण एशिया में इस तरह की प्रवृतियों के हावी होने के कई गहरे संकेत हैं. भारत की एक बड़ी आर्थिकी के रूप में उभरने के बाद भी एक समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सेदार बनने के अंतरविरोधों का शिकार है.

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भारत का संविधान राष्ट्रनिर्माण की आधारशिाला है. इसलिए जरूरी है कि चुनावी प्रचार अभियान में अतिवादी रूझानों को हरहाल में खत्म किया जाना चाहिए. सामाजिक और राजनीतिक सवालों के इर्दगिर्द चुनाव को स्वतंत्र और विवेकपूर्ण परिवेश प्रदान किया जाना चाहिए.

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