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दर्द-ए-पारा शिक्षक : मानदेय से नहीं सिलाई से चलता है घर, आंखों में है परेशानी पर आर्थिक तंगी में कैसे कराएं इलाज

सरकारी आदेश के बाद बकरी बेचकर मोबाइल ली थी, वो भी टूट गया

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Ranchi :  लोगों के घरों के कपड़े नहीं सिले तो घर नहीं चलेगा. पति तो दैनिक मजदूरी करते है. काम मिला तो ठीक नहीं तो घर पर ही रहते हैं. पूरा घर तो मानदेय पर टिका है. ये कहना है एक पारा शिक्षिक का.

ऐसी पारा शिक्षिका, जो अपने घर वालों का पेट पालने के लिए सिलाई करती हैं.  दिनभर स्कूल में बच्चों को स्कूली ज्ञान देती हैं और घर आकर सिलाई का काम करती हैं और वो भी रात के 12-2 बजे तक.

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इतना मेहनत करने वाली महिला पर क्या बीतती होगी, दिनभर ही नहीं देर रात तक मेहनत करने के बाद. इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं. ये शिक्षिक हैं बीना लकड़ा.

जो साल 2007 से पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. इनका कहना है कि मानदेय समय पर मिले न मिले फर्क नहीं पड़ता, मुझे तो सिलाई करना ही है. पति की कमाई कुछ खास है नहीं. जो सरकार देती है, वो तो उधार कर्ज में ही चला जाता है. ऐसे में भविष्य की क्या सोचें.

बच्चों को पढ़ा ले रहे हैं, यही बहुत है. राशन कार्ड है, जिससे थोड़ा सहारा है. कम से कम अनाज मिल जा रहा है. नहीं तो सिलाई करके परिवार चलाना मुश्किल है. इन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान इन्होंने 30,000 कर्ज लिया था, जो अभी तक चुका नहीं पाई. वर्तमान में ये शिक्षिका नवसृजित प्राथमिक विद्यालय बड़ाम में कार्यरत हैं.

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बकरी बेचकर ली मोबाइल, विभाग का आदेश जो था

सरकारी आदेशों की बात करते हुए बीना ने बताया कि, साल 2017 में पारा शिक्षकों को अनिवार्य रूप से डिजिटल मोबाइल रखने का आदेश दिया गया. ऐसे ही समय-समय पर मानदेय रोक दिया जाता है. तब भी पैसे नहीं थे. तब बकरी बेचकर मोबाइल लिया और वो भी टूट गया. वहीं बीईओ की ओर से हर बैठक में आदेश का हवाला देकर बातें बोली जाती हैं. तब इंश्योरेंस में मोबाइल खरीदी, जो अब तक है.

लेकिन इसका ईएमआइ अभी तक नहीं दे पाई हूं. जबकि मोबाईल लिए दो साल होने को हैं. हर माह 1500 रूपये मोबाईल का ईएमआइ देना होता है. 1800 रूपये अब भी बाकी हैं, जो सूद मिलाकर अब 4000 हो गए हैं. बेटा स्कूल में पढ़ता है, री एडमिशन नहीं होने पर स्कूल की ओर से भी बच्चे को परेशान किया जाता था.

ऐसे में रिश्तेदारों से 30,000 कर्ज लेकर री एडमिशन कराया. अब जो पैसा सरकार देगी, वो कर्ज चुकाने में जाएगा.

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ऑटो भाड़ा के कारण बेटी कॉलेज नहीं जा रही

आर्थिक स्थिति के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि घर की स्थिति इस हद तक गिर गई है कि, बेटी को कॉलेज भेजने के लिए ऑटो भाड़ा तक नहीं है. दोस्तों से नोट्स अरेंज करके बेटी पढ़ाई कर रही है. दैनिक उपयोगी वस्तुओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पिछले दिनों बाजार गई थी और पास में पैसे कम थे.

बेटी ने अचानक मार्कर लाने की बात की. खरीदारी करते हुए पैसे खर्च हो गए और मेरे पास सिर्फ ऑटो भाड़ा देने के लिए ही पैसे बचा. ऐसे में अपनी बेटी के लिए 15 रूपये का मार्कर तक नहीं ले पाई. आंखें नम करते हुए बीना ने कहा कि, एक मां होने के नाते मुझे बहुत ग्लानि हुई.

आगे बताया कि, कई दिनों तक बेटी ने उनसे बात भी नहीं की. सब्जियों में अधिक खर्च तो होता नहीं, क्योंकि हमारे यहां फुटकल, कटई साग, चाकोर आदि को सुखा कर रखते हैं.

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तो इसी को बनाकर  खाते है. बच्चे भी अब जीना सीख गए हैं. बीना ने कहा कि जनवरी माह से गैस का सिलिंडर खाली है, जिसे भरवाने के लिए पैसे नही हैं. लकड़ी और पत्ता चुनकर खाना बना रही हूं. ऐसे भी कभी समय पर गैस नहीं भरा पाती. लकड़ी और कोयला ही सहारा है.

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आयुष्मान कार्ड होते हुए भी इलाज नहीं करा पा रही

खर्च की बातें करते हुए बीना ने कहा कि, घर में ससुर भी बीमार रहते हैं. उन्हें लीवर की परेशानी है.  हर महीने उनकी दवाईयों पर 3500 खर्च होते हैं. किसी तरह करके ससुर को दवाई खिला रहे हैं.

कभी-कभी तो पैसे के अभाव में दवाई नहीं खरीद पाते और ससुर को दर्द से तड़पता देख मन बहुत बेचैन हो जाता है. लेकिन दवाई बंद करने से परेशानी और बढ़ेगी. पड़ोसियों और रिश्तेदारों से लेकर ससुर के दवाई का खर्च चल रहा है.

अपनी बीमारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज कल सिलाई अधिक करना पड़ रहा है. आंख में भी तकलीफ है. छुट्टी के दौरान अधिक समय दे रही हूं. डॉक्टर से फीस के कारण इलाज नहीं करा पा रहे. आयुष्मान कार्ड पति के नाम से है.

लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों कहना है कि कार्ड से एडमिट हुए बिना इलाज नहीं होगा. उनका कहना है कि जब तक सरकार पैसा नहीं भेजती, तब तक भर्ती ही रहना पड़ेगा.

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दूध पारा शिक्षकों के नसीब में नहीं

बहुत खराब लगता है, जब बच्चों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते. लोगों से बातें तो सुननी हैं ही. घर में कई बार झगड़े हो जाते हैं. बिजली बिल छह माह से बकाया है.

दूध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दूध तो पारा शिक्षकों के नसीब में है ही नहीं. सिर्फ मेरे घर की ही बात नहीं है, पारा शिक्षक आपस में भी बात करते हैं कि दूध कभी नहीं ले पाते.

बीना ने इससे आगे कहा कि आठ हजार की नौकरी में दूध कहां से ले पाएंगे. जो मानदेय सरकार देती है, वो सिर्फ कर्ज में चला जाता है. अन्य खर्च भी है प्रतिदिन का, जिसे रोका नहीं जा सकता.

साबुन और सर्फ तो स्थानीय बाजार से थोक में उठा लेते हैं. वो भी जो सस्ता होता है. अच्छे और महंगे साबुन तो पैसे के अभाव में कभी खरीद नहीं पाते.

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