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दर्द ए पारा शिक्षक: मानदेय के भरोसे घर नहीं चलता, बच्चों को पढ़ाने के बाद मास्टर साहब आटो चलाते हैं  

फरवरी से मानदेय रोके जाने के बाद तीन बकरी बेचनी पडी, 20,000 कर्ज है, एक साल से नहीं चुका पा रहेफरवरी से मानदेय रोके जाने के बाद तीन बकरी बेचनी पडी, 20,000 कर्ज है, एक साल से नहीं चुका पा रहे

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Ranchi :  सिर्फ मानदेय और वेतन का फर्क है . काम पारा शिक्षक भी इतना ही करते हैं,  जितना एक सरकारी शिक्षक. इसके बावजूद सरकार पारा शिक्षकों के साथ भेदभाव करती है. हमारा भी परिवार है किस हद तक परेशानी होती है ये बताया नहीं जा सकता.

ये कहना हमारा नहीं, एक पारा शिक्षक का है. जो पार्ट टाइम में आटो चलाते हैं. जी हां, स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के बाद आटो चलाते है. ये शिक्षक हैं अनगढ़ा ब्लाक के धनेश्वर महली. जो साल 2002 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं.

वर्तमान में अपग्रेडेड स्कूल कटहरटोली में कार्यरत हैं. अपने बारे में बताते हुए कहा कि अगर ये पारा शिक्षक की नौकरी के साथ आटो नहीं चलाएंगे तो इनका घर नहीं चल सकता. क्योंकि मानदेय इतना है नहीं. बताया कि माता पिता ने आटो खरीदा था. जब पारा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन की तो, लगा था कि कभी न कभी स्थायीकरण होगा. लेकिन अब स्थिति और भी बदतर होती जा रही है. थोड़ी बहुत खेती तो करते हैं.

लेकिन स्कूल से समय नहीं मिल पाता है कि खेती अधिक हो. घर में खाने भर खेती हो जाती है. इन्होंने बताया कि पार्ट टाइम में आटो चलाने से प्रति दिन 300 रूपये तक कमाई होती है. बाजार के दिनों में ही लोग आटो का उपयोग करते है. खाली दिन में तो आटो चला के भी कोई फायदा नहीं.

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फरवरी से लेकर अब तक तीन बकरी बेची

फरवरी से मानदेय बंद होने की बात कहने पर इन्होंने कहा कि इस दौरान इन्होंने तीन बकरी बेचप. ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण आटो का इस्तेमाल भी लोग हमेशा नहीं करते हैं. ऐसे में पिछले पांच माह के दौरान तीन बकरियां बेच कर घर का पोषण हुआ. राशन कार्ड है लेकिन अनाज छोड़ के कुछ मिलता नहीं. घर में पत्नी, दो बेटे, बहू और पोते हैं. ऐसे में खर्च अधिक है. बीमारी तक के लिए बकरी और मुर्गी बेचनी पड़ रही है.

मानदेय के भरोसे रहते तो घर तो चलता ही नहीं, लोग कहते है पारा शिक्षक है तो मुर्गी बकरी बेचने की जरूरत क्या है लेकिन सोचने वाली बात है परिवार को कैसे चलाएं. पहले तो मानदेय सही समय में मिल जाता था लेकिन 2014 के बाद से काफी परेशानी होने लगी. हमेशा मानदेय रोक दिया जाने लगा.

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कोई सरकारी सुविधा नहीं मिलती

सरकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि पारा शिक्षक के नाम से हमें कोई सरकारी सुविधा नहीं मिलती. माता पिता के नाम से राशन कार्ड है तो चल रहा है. लेकिन अपना तो कुछ नहीं है. उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर के लिए अप्लाई किया लेकिन वो भी मिला नहीं. स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय बनाने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं मिला.

मुखिया को जानकारी देने से कहा जाता है कि पारा शिक्षक है सरकारी पैसा मिलता है तो सरकारी लाभ कैसे दिया जाएगा. जबकि वास्तविकता तो यही है कि पारा शिक्षकों को मानदेय इतना है नहीं कि हम कुछ बड़ा परिवार के लिए करें. टेंपो के कारण थोड़ा राहत है नहीं तो परिवार नहीं चलता.

बेटा मजदूरी करता है, आइटीआइ पास है

अपने परिवार का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि इनके बड़े बेटे आइटीआइ किए हुए है. लेकिन नौकरी नहीं मिलने के कारण ये कांटा टोली के आस पास मजदूरी करते हैं. कभी कभार ये रिंग बनाने का काम करते है. बेटे से आर्थिक सहयोग की बात करते हुए इन्होंने कहा कि बेटे से सहयोग की कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि बेटा कभी मदद नहीं करता. कितना कमाता है क्या करता है इसकी कोई जानकारी नहीं है.

हर छोटी छोटी चीज में कटौती करना अब आदत सी बन गई है. परिवार वाले भी सीख गए है. कम से कम इतना राहत है कि घर की साग सब्जी हो जाती है.

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महिला समिति से 20,000 कर्ज है लेकिन चुका नहीं पा रहे

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धनेश्वर महली ने  बताया कि इन्होंने महिला समिति से 20,000 रूपये कर्ज लिया है. वो भी एक साल पहले. लेकिन अभी तक चुका नहीं पाये है. एक बेटी थी. उसकी शादी भी कर्ज लेकर की गई. लेकिन वो भी अब तक नहीं हो दे पाये है. गांव है तो लोग सहयोग करते हैं. बिजली का बिल तो छह माह से दिया नहीं है. इससे ज्यादा और क्या बताएं. लोग सोचते है आटो चलाते है तो अधिक कमाई होती है लेकिन सच्चाई तो यही है कि स्कूल आने जाने तक के लिए भी कभी कभी पैसे नहीं होते है. ऐसे में कुछ न कुछ तो करना होगा.

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