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दर्द-ए-पारा शिक्षक : जिस कमरे में रहते हैं उसी में बकरी पालते हैं, उधार इतना है कि घर बनाना तो सपने जैसा

48,000 उधार ले दो बच्चों का रीएडमिशन कराया, फिर भी बकाया है फीस

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Chhaya

Ranchi :  शिक्षक गैस सिलेंडर नहीं भरा पा रहे ये तो हमने आपको बताया. लेकिन कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं, जिन्होंने पैसे के अभाव में गैस खरीदा ही नहीं, क्योंकि इनके पास इतने पैसे हैं नहीं कि ये गैस सिलेंडर भरा सकें.  ये पारा शिक्षक है. जिनका नाम लखीचरण प्रमाणिक है. साल 2002 से ये पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं. पारिवारिक खेती बाड़ी है नहीं कि ये अपने घर का गुजारा कर सकें. अपने बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि जिस उम्मीद के साथ पारा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन की थी, अब लगता है वो पूरा नहीं हो पाएगा.

इन्होंने बताया कि उधार में इस कदर डूब गये हैं कि कैसे उधार चुकाएं समझ नहीं आता. इन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि मानदेय कभी भी इतना नहीं रहा कि ये गैस सिलेंडर ले सकें. लखीचरण ने थोड़ा खीझते हुए कहा कि उज्जवला योजना से भी गैस लेने की कोशिश नहीं की क्योंकि यदि लेता तो फिर गैस सिलेंडर कैसे भरवा पाता.

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उन्होंने बताया कि घर के कुछ दूरा पर जंगल है, वहीं से स्कूल के बाद लकड़ी और पत्ते लाकर जलाते हैं. गैस ले भी लें तो भरा नहीं सकते. क्योंकि पैसा कब मिले और कितना कर्ज रहे ये तय नहीं रहता. वर्तमान में ये नव सृजित प्राथमिक विद्यालय हरबूल में कार्यरत हैं.

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नौकरी से परेशान होकर बकरी पालन शुरू किया

अन्य विकल्प के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि एक कमरे का घर है, उसी में खाना बनाना, रहना, सोना और बकरी पालन भी करते हैं. बकरी पालन के बारे में कहा कि साल 2015 से इन्होंने बकरी पालन शुरू किया. क्योंकि मानदेय कभी भी इतना नहीं रहा कि घर का खर्च चल पाए. राशन कार्ड है, लेकिन इससे मिलने वाला अनाज काफी नहीं है. इसके अलावा अन्य चीजों की भी जरूरत होती है. इन्होंने कहा कि जरूरत होने पर ये आसपास के बाजार में बकरी बेचते हैं. ताकि घर की जरूरत पूरी हो सके. लेकिन स्कूल खुलने के बाद परेशानी हो जाती है.

पारा शिक्षक की नौकरी के पहले की बातें करते हुए इन्होंने कहा कि इसके पहले ये ठेकेदारी करते थे. ठेकेदारी छोड़कर इन्होंने पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी, लेकिन अब इन्हें अपनी स्थिति पर अफसोस होता है कि क्यों इन्होंने पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी.

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पत्नी करती है कपड़े सिलाई जिससे मदद मिल जाती है

लखीचरण ने कहा कि उनकी पत्नी कपड़े सिलाई करती हैं. जिससे सौ डेढ़ सौ की कमाई लगभग प्रति दिन हो जाती है. इससे से घर का का कुछ उपरी खर्च चलता है. बच्चों के रीएडमिशन का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि महिला समिति से 48,000 कर्ज लिया है. साथ ही कहा कि बच्चों का पिछले सत्र का फीस बकाया है,जो लगभग 6500 है.

पारा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन करने के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि जब पारा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन की तो लगा था कि आज नहीं तो कल सरकार हमारा स्थाईकरण करेगी. लेकिन दिन बीतते जा रहे हैं और हमारे लिए सरकार की उदासीनता स्पष्ट दिखती है. बातचीत के दौरान इन्होंने कहा कि कभी-कभी तो स्थिति ऐसी होती है कि चाकोर और राई फूल आदि के साग से काम चला लेते हैं.

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मानदेय से तीन जगहों पर कर्ज चुकाया, लेकिन फिर भी उधार

अप्रैल माह के मानदेय के बारे में लखीचरण ने बताया कि मानदेय जितना दिया जाता है, उतना काफी नहीं है. इससे संतुष्टी तो नहीं है, पर अब कोई दूसरी नौकरी भी नहीं सकते हैं. इस बार चार माह का मानदेय रोका गया. जिसके बाद अप्रैल में मानदेय तो मिला, लेकिन वो सब कर्ज देने में ही खत्म हो गया.

लखीचरम ने बताया कि तीन लोगों का कर्ज तो मानदेय मिलते ही चुका दिया, लेकिन  अभी भी काफी उधार बाकी है. पिछले कई सालों से घर मरम्मत नहीं करा पा रहे हैं. स्थिति ऐसी है कि जिसमें रहते हैं, उसके दीवार पर भी पलस्तर नहीं करा पा रहे हैं. साथ ही बताया कि जिस घर में रहते हैं , उसी कमरे के दूसरी तरफ बकरियों को रखते हैं. जिससे बहुत परेशानी होती है, पैसे हैं नहीं कि कोई और कमरा बना सकें.

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