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दर्द-ए-पारा शिक्षक: मानदेय से घर चलाना है मुश्किल, उम्र के इस पड़ाव में दूसरी नौकरी कहां खोजें

दिव्यांग पिता घर चलाने के लिये करते हैं खेती, स्कूल से नहीं मिलता समय

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Chhaya

Ranchi :  अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर काफी संशय लगा रहता है. पारा शिक्षक की नौकरी की क्या स्थिति है, सभी जानते हैं. परिवार वालों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाते. स्थिति ऐसी है कि पिताजी को बुढ़ापा में खेती करनी पड़ती है. ये कहना है पारा शिक्षक प्रदीप कुमार महतो का. जो साल 2002 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे है. वर्तमान में ये उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय सरायटोली नामकुम के शिक्षक हैं. अपने घर की स्थिति बताते हुए इन्होंने कहा कि इनके पिता दिव्यांग हैं. दाहिने हाथ से कुछ नहीं कर सकते. इसके बावजूद इनके पिता खेती करते हैं. क्योंकि घर चलाने वाला कोई नहीं है.

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प्रदीप कहते हैं कि पिता ज्यादा नहीं कर पाते. जितना होता है, खेती कर लेते हैं. बेटा होते हुए काफी अफसोस होता है कि अब ऐसी परिस्थिति है कि नौकरी छोड़ भी नहीं सकते. पिताजी को मुझे बुढ़ापे की लाठी बनाना था, पर अब वे ही मेरी लाठी बने हुए हैं. स्कूल से समय नहीं मिलने की वजह से खेती भी नहीं कर पाते. राशन कार्ड है, जिससे घर तो चल जा रहा है. लेकिन खाने के लिये अनाज काफी नहीं है. अन्य चीजों की भी जरूरतें होती हैं. घर में माता-पिता, बहन, पत्नी और दो बच्चे हैं. दोनों स्कूल जाते हैं. किस तरह घर चल रहा है बताना बहुत मुश्किल है.

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छह माह का फीस एलआईसी के पैसे से भरें

बच्चों की फीस का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि फीस छह माह से बकाया था. लेकिन पिछले साल एलआईसी का मैच्यूरिटी अमाउंट मिला तो उसी से दोनों बच्चों की फीस और रिएडमिशन किया गया. इसी पैसे से कॉपी और किताब भी खरीदें. लेकिन अप्रैल से फीस नहीं भर पाये हैं. वर्तमान में फिर से फीस बकाया हो गया है. साल 2017 का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि बहन की शादी के लिये 70 हजार महिला समिति से कर्ज लिया है. कुछ पैसे तो दिये, लेकिन अभी भी 55 हजार उधार है. बैंक का भी लोन है, जिसका किस्त किसी तरह हर महीने देना ही पड़ता है. जो काफी मुश्किल है. समय अगर मिलता तो मजदूरी करते. लेकिन स्कूल जाने के बाद समय नहीं मिलता.

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शिक्षक के मर्यादा को नहीं कायम रख पा रहे

बात करते-करते इन्होंने बताया कि शिक्षक हैं, जब शुरू में नौकरी पकड़ी थी तो बहुत सम्मान मिलता था. अब तो वैसा सम्मान नहीं मिलता. मानदेय रोक दिया जाता है. राशन भी उधार में ही लेते हैं. ऐसे में शिक्षक की मर्यादा को भी कायम नहीं रख पाते. लोग भी बातें सुनाते हैं. एक महीने के नाम पर उधार लेते हैं लेकिन चुका लेते हैं और तीन-चार महीने हो जाते हैं. गांव के लोग जानते हुए भी जवाब मांगते हैं. ऐसे में सम्मान कैसे संभव है.

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कितनी विषम परिस्थितियों में घर चला रहे हैं, ये बता पाना मुश्किल है. घर की स्थिति के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि, फरवरी से अबतक कई बार धान भी बेचा है. सब्जियां तो लगता है कि किस्मत में है ही नहीं. गांव में जो थोड़ा बहुत मिल जाता है , उसी से काम चला लेते हैं. हाट बाजार जाकर खरीदना संभव नहीं है. बच्चों की भी इच्छाओं को पूरी नहीं कर पाते.

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जीवन रक्षक जरूरतों को पूरा प्राथमिकता रहती है

प्रदीप ने बताया कि मानदेय इतना है नहीं कि घर सही से चले. परिवार भी बड़ा है और. अभी भी एक बहन की शादी करनी है. लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है. जो मानदेय मिलता है, वो मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में ही लग जाता है. मूलभूत भी नहीं इसे हम जीवन रक्षक ही कह सकते हैं. मानदेय मिलते ही पहले प्राथमिक जरूरतों पर ध्यान रहता है. कुछ पैसे बचाने भी तो होते हैं. क्योंकि फिर मानदेय कब मिलेगा, इसकी कोई जानकारी नहीं होती. इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं, लेकिन हो नहीं सकता ये जानते हैं. इसलिए उपरी चीजों पर ध्यान नहीं देते. मानदेय से मूल आवश्यकताएं तक पूरी नहीं होतीं.

पारा शिक्षक की नौकरी में स्थायीकरण या समायोजन हो जाये, पहले उम्मीद भी थी, लेकिन अब नहीं रहा. इसी उम्मीद में दो बार टेट पास किये. लेकिन फिर भी समायोजन नहीं हुआ. अब तो मुश्किल से 12-15 साल नौकरी ही बची है. कोई दूसरा विकल्प अपना नहीं सकते. बिजनेस करने की सोचते हैं, लेकिन उसके लिये भी पूंजी चाहिए. जो पारा शिक्षक की नौकरी करते हुए संभव नहीं है.

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मानदेय रूकने से आफत आ जाती है

बातचीत के दौरान प्रदीप ने कहा कि मानदेय बहुत ही कम है. ऐसे में चार-पांच माह रोक देने से पहाड़ टूट पड़ता है. लंबे परिवार में तो घर चलाना और भी मुश्किल है. नियमित मानदेय मिलने से घर किसी तरह चल जाता है. लेकिन रोक देने से बहुत मुश्किल हो जाती है. मोबाइल और यूनिफॉर्म का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि आदेश विभाग की ओर से दिया गया था, लेकिन मोबाइल सिर्फ संचार माध्यम के लिये इस्तेमाल करते हैं.

इससे अधिक हो भी नहीं सकता. वहीं यूनिफॉर्म की बात करते हुए इन्होंने कहा कि अभी मात्र एक जोड़ा यूनिफॉर्म है, जिसकी हालत दयनीय है. विभाग आदेश दे देती है. ऐसे में घर की जरूरतों से कटौती करके इन आदेशों का पालन किया जाता है.

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