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हेमंत करकरे की शहादत का अपमान करने वाली प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में प्रधानमंत्री

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मुंबई आतंकी हमले के शिकार हेमंत करकरे का अपमान करने और उनको मौत का श्राप देने वाले प्रज्ञा टाकुर के पक्ष में प्रधानमंत्री मोदी के बयान ने भारतीय राजनीति में आतंकवादी गतिविधयों को ले कर चल रहे हिपोक्रेसी को बहुत साफ तौर पर उजागर कर दिया है.

भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में आतंकवाद को एक बडा मुद्दा बनाया है. भाजपा ने नरेंद्र मोदी की बड़ी सी तस्वीर के साथ  होडिेंग लगाया है. जिसमें लिखा है- जीतेगा देश और हारेगा आतंकवाद.

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प्रज्ञा ठाकुर को पार्टी में शामिल कर और टिकट दे कर भाजपा ने अपने ही इस प्रचार सामग्री के संदर्भ में सवाल खड़े कर लिये हैं. प्रज्ञा ठाकुर पर आतंकवादी गतिविधियों के मामले को ले कर मुकदमा चल रहा है और स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिये जाने पर अदालत ने उनको जमानत दी है.

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अदालत ने उन्हें मालेगांव बम विस्फोट मामले से बरी नहीं किया है. बल्कि एनआईए की भूमिका को ले कर नारजगी ही जतायी है.

प्रधानमंत्री मोदी प्रज्ञा ठाकुर को भारतीय हिंदू संस्कृति का प्रतीक बता कर कह रहे हैं कि रायबरेली और अमेठी के उम्मीदवार भी बेल पर ही हैं. लेकिन उनकी चर्चा नहीं कर केवल प्रज्ञा ठाकुर का हवाला दिया जा रहा है.

प्रधानमंत्री का वक्तव्य आलोचना का शिकार हो रहा है. प्रधानमंत्री आतंकी हत्या के मामले ओर उसके प्रमुख अभियुक्त के बेल की तुलना आर्थिक मामलों के एक केस के बेल से कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री को पता है कि दोनो बेल की प्रकृति एक जैसी नहीं है. बावजूद प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में मोदी का उतराना आतंकवाद के खिलाफ भाजपा की नीति के दोहरेपन को ही दिखाता है. आतंकवाद के प्रति इस तरह का लचीलापन भारत को विश्व के सामने नैतिक और तार्किक रूप से कमजोर ही करेगा.

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पाकिस्तान के चुनावों में हाफिज सईद और उसकी पार्टी के चुनाव में उतरने पर भारत सहित दुनिया भर में प्रतिक्रिया हुई थी. यहां तक कि पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी ने भी इसकी निंदा की थी.

और चुनावों से उन्हें बाहर करने की मांग की थी. चुनावों के परिणाम में देखा गया कि मतदाताओं ने  हाफिज सईद की पार्टी को नकार दिया था. दुनिया भर के लोकतांत्रिक ताकतों ने इस का स्वागत किया था.

प्रज्ञा ठाकुर का मामला भी इसी तरह दुनिया भर के लोकतांत्रिक समूहों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.

प्रधानमंत्री ने प्रज्ञा ठाकुर का जिस तरह पक्ष लिया है, उससे जाहिर होता है कि कि भाजपा राष्ट्रवाद और आतंकवाद को बेहद संकीर्ण नजरिये से देखती है. पकिस्तान से यह सबक तो भारत को सीखना ही चाहिए कि आतंकवाद को पालते-पोसते वह भी आतंकवाद का शिकार हो गया है.

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वहां अब तक 70 हजार नागरिक आतंकवादी हमलों में मारे गये हैं. इसमें सेनाकर्मी भी शामिल हैं. आतंकवाद एक बड़ा मर्ज है और उसे खत्म करने का कोई भी संकीर्ण नजरिया देश और समाज के लिए घातक ही है.

प्रज्ञा ठाकुर ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख को श्राप दिया था कि उसकी मृत्यु होगी ओर इसके सवा महीने बाद ही करकरे आतंकी हमले में शहीद हुए थे.

लेकिन प्रज्ञा ठाकुर करकरे की शहादत का खुला अपमान कर रही हैं और भाजपा के नेता उसका खुला बचाव ही नहीं कर रहे बल्कि प्रज्ञा ठाकुर को हिंदुत्व का प्रतीक बता रहे हैं. प्रज्ञा ठाकुर के कथन के बाद देश के भीतर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.

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और आइपीएस एसोशिएशन ने भी इसका प्रतिकार किया. पज्ञा ठाकुर ने इस कथन पर अब कहा है कि यदि उनकी इन बातों से किसी को ठेस लगी है तो वह खेद प्रकट करती हैं.

उनके बयान से साफ जाहिर है उन्हें अपने बयान का कोई पछतावा नहीं है. चुनाव मैदान में उतरने के बाद वो भोपाल में जिस तरह सांप्रदायिक कार्ड खेल रही हैं, उससे भी जाहिर होता है कि भाजपा ने इस चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण को तेज कर दिया है.

भाजपा का यह एजेंडा चुनाव दर चुनाव ही सामने आता रहता है. भाजपा के नेतृत्व से अब किसी को अपेक्षा भी नहीं है कि वह खुलकर इस तरह की प्रक्रिया के खिलाफ कदम उठायेंगे.

भारत की संसकृति के सवाल को भाजपा और प्रधानमंत्री ने प्रज्ञा ठाकुर के संदर्भ में जिस तरह पेश किया है, उसे ले कर भी भारी प्रतिक्रिया हो रही है. यह प्रतिक्रिया भारत की उदारमना समूहों की ओर से हो रही है.

चुनावों में जिस तरह का विमर्श खडा हो रहा है उससे आइडिया आफ इंडिया की चेतना और अवधारणा बेहद संकट में दिख रही है.

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