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झारखंड में भाजपा का सीएम चेहरा रघुवर दास ही हैं भ्रष्टाचार के आरोपी

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Surjit Singh

झारखंड विधानसभा चुनाव-2019 का प्रचार अभियान परवान पर है. भारतीय जनता पार्टी के राज्य से लेकर केंद्र तक के नेता प्रचार के दौरान झारखंड के भ्रष्टाचार पर वार करते हैं. भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार कहते नहीं थकते.

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जायज भी है. भला कोई क्यों नहीं चाहेगा कि झारखंड में एक ऐसी सरकार बने जो भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था दे सके. पर क्या यह तब संभव है जब उस राज्य का मुख्यमंत्री और चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा ही भ्रष्टाचार का आरोपी हो.

भाजपा के नेताओं को दूसरे दल के नेताओं का भ्रष्टाचार तो नजर आता है, पर वह इस सच को छिपा जाते हैं कि झारखंड विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी का सीएम फेस रघुवर दास का चेहरा दागदार है. रघुवर दास पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप है. जिसकी जांच नहीं हुई है.

हाई कोर्ट के आदेश पर भी कार्रवाई नहीं हुई. मुख्यमंत्री रहते हुए रघुवर दास ने जांच को आगे बढ़ने नहीं दिया. भ्रष्टाचार के जो आरोप हैं, वह यह कि उन्होंने नगर विकास मंत्री के पद पर रहते हुए मैनहर्ट कंपनी को नाजायज तरीके से आर्थिक फायदा पहुंचाया. सरयू राय, जो रघुवर सरकार में मंत्री थे, अब रघुवर दास के खिलाफ चुनाव में खड़े हैं, उन्होंने सरकार में रहते हुए भी रघुवर दास के इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठायी थी. पर उनकी आवाज अनसुनी कर दी गई.

सरयू राय ने झारखंड में भ्रष्टाचार की जानकारी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी दी थी. पार्टी ने भी रघुवर दास के भ्रष्टाचार पर चुप्पी साध ली. अब वही अमित शाह चुनाव प्रचार में झारखंड में भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं. भ्रष्टाचार पर भाजपा की दोहरी नीति का यह बड़ा उदाहरण है.

अब पहले यह समझिये, रघुवर दास पर भ्रष्टाचार का जो आरोप है, वह है क्या?
2006 में रघुवर दास, नगर विकास मंत्री थे. रांची शहर में सिवरेज-ड्रेनेज योजना पर काम होना था. विभाग ने इस काम के लिए ORG/SPAM Private Limited का चयन किया.

कंपनी ने काम शुरू कर दिया. करीब 75 फीसदी डीपीआर बनने के बाद कंपनी से काम वापस ले लिया गया और काम मैनहर्ट कंपनी को दे दिया गया. आरोप है कि मैनहर्ट कंपनी को काम देने के लिए विभाग ने शर्तों का उल्लंघन किया.

शर्त थी कि उसी कंपनी को काम मिलेगा, जिसका टर्नओवर 300 करोड़ है और जिसे सिवरेज और ड्रेनेज दोनों तरह के काम में तीन साल काम करने का अनुभव हो. मैनहर्ट कंपनी शर्तों को पूरा नहीं करती थी. बावजूद इसके विभाग ने इस कंपनी को काम दे दिया.

मामला विधानसभा में उठा. विधानसभा ने जांच के लिये एक कमेटी बनायी. जिसमें विधायक सरयू राय, प्रदीप यादव और सुखदेव भगत सदस्य थे. समिति ने रिपोर्ट सौंपी की मैनहर्ट को काम देने में गड़बड़ी हुई है. समिति ने मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराने की सिफारिश की. लेकिन जांच नहीं हुई.

इसके बाद वर्ष 2010 में मो. ताहिर नाम के एक शख्स ने मामले को लेकर हाईकोर्ट में पीआइएल दर्ज की. पीआइएल की सुनवाई करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस भगवती प्रसाद और नरेंद्र नाथ तिवारी ने 18 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया.

दो जजों वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को डीजी विजिलेंस के पास जाकर शिकायत दर्ज कराने के लिए कहा. आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता की शिकायत में किसी तरह कोई सच्चाई है, तो आगे की कानूनी कार्रवाई हो. विजिलेंस ने पीई दर्ज करते हुए मामले की जांच की. जांच में गड़बड़ी पायी गयी.

मामले में एफआइआर दर्ज करने के लिए विजिलेंस के तत्कालीन आईजी एमवी राव की तरफ से पांच बार मार्ग दर्शन मांगे जाने के बावजूद निगरानी आयुक्त कार्यालय से कोई मार्गदर्शन नहीं आया. लिहाजा निगरानी की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी.

बताते चलें कि उस वक्त निगरानी आयुक्त राजबाला वर्मा थीं. उसी राजबाला वर्मा को मुख्यमंत्री बनने पर रघुवर दास  ने मुख्य सचिव बनाया था. औऱ वह राज्य की सबसे विवादास्पद मुख्य सचिव रहीं. विपक्ष ही नहीं, सरकार के लोगों ने भी राजबाला वर्मा पर कई गंभीर आरोप लगाये. पर रघुवर दास ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसी भी आरोप की जांच नहीं करायी.

कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में वर्ष 2012 में दूसरा और वर्ष 2016 में तीसरी बार झारखंड हाईकोर्ट में पीआइएल दाखिल की गयी. 28 सितंबर 2018 को हाईकोर्ट के जस्टिस अनुरूद्ध बोस और जस्टिस डीएन पटेल ने फैसला दिया कि निगरानी आयुक्त विजिलेंस के तत्कालीन आइजी एमवी राव ने जो पत्र लिखे थे, उस पर वाजिब समय में फैसला ले.

उस वक्त आइएएस एसके रहाटे निगरानी आयुक्त थे. समझा जा सकता है, जब भ्रष्टाचार का आरोप जिस व्यक्ति पर हो और वह व्यक्ति ही राज्य का मुख्यमंत्री हो, तब अफसरों को कार्रवाई करने में कितनी परेशानी हो सकती है. लिहाजा एसके रहाटे ने या उनके बाद इस पद पर आये अधिकारी ने हाईकोर्ट के आदेश पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया.

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