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असहमत विचारों को खामोश किया जाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृति है

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Faisal Anurag

स्वतंत्र और सत्ता की नीतियों के प्रति असहमति जताना आसान नहीं रह जाये तो यह मूल्यांकन जरूरी है कि इसकी जड़ें आखिर हैं तो कहां हैं. व्यक्ति चाहे सेलिब्रेटी हो या आम, आज खुल कर अपनी बात कहने से हिचक रहा है. फिल्मकार अनुराग कश्यप ने ट्विटर पर अब आगे सक्रिय नहीं होने की घोषणा करते हुए जिन अल्फाज को प्रकट किया है, वे किसी लाइलाज होते जा रहे मर्ज का संकेत हैं.

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आपातकाल के दौरान भी हालात गंभीर थे लेकिन इतने नहीं. तब सरकार अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों को सेंसर करती थी लेकिन ट्रोल जैसी कोई  परिकल्पना नहीं थी. अब एक अजीब किस्म का माहौल है जहां यह पता लगाना मुश्किल नहीं है कि ट्रोल  आखिर किसके इशारे और संरक्षण से इतना हौसला हासिल कर रहे हैं.

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दुनिया के इतिहास ने देखा है कि इस तरह की घटनओं ने किस तरह लोकतंत्र को खतम किया है. भारत में भी जिस तरह एकाधिकारवाद को व्यापक समर्थक मिल रहा है. यह लोकतंत्र की परंपराओं और आजादी के तामाम मूल्यों की कीमत पर विकसित हो रहा है. हाल के दिनों में वे मीडियाकर्मी और भिन्न क्षेत्र के सेलिब्रेटिज चुप किये जा चुके हैं और जो मुखर हैं उन्हें अनेक तरह की धमकियां दी जा रही हैं.

यहां तक कि उनके परिवार के सदस्यों खास कर महिलाओं को धमकी की जद में लिया जा रहा है. दुखद यह हे कि हिंदी मीडिया चाहे वो प्रिंट या विजुअल, जिस तरह की भूमिका निभा रहा है, उससे साफ जाहिर होता है कि मीडिया के स्थापित मूल्यों को अब बहुत पीछे छोड़ दिया गया है.

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भारत के संविधान में बुनियादी अधिकारों की गारंटी की गयी है. खास कर अभिव्यक्ति उसमें अहम है. संविधान सभा ने इस पर विसतार से चर्चा किया था और अंग्रेजी शासन के तमाम प्रतिबंधों ओर अत्यचारों के अनुभवों ने संविधान सभा के सदस्यों के विचारों में स्थान पाया था. आजादी के तुरंत बाद मौलाना आजाद ने इंनफार्मर  सिटेजनरी की बात की थी. जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है. तब के तमाम दीगर नेताओं ने भी इसका समर्थन किया था. और एक स्वतंत्र मीडिया की भूमिका रेखांकित हो सके, इसे बेहद अहम माना था. लेकिन वर्तमान में सबसे ज्यादा नुकसान सूचनाओं की विविधता का ही हुआ है.

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सूचना पर प्रोपगेंडा के हावी हो जाने के कारण तथ्य का अतापता होना मुश्किल हो जाता है. स्वतंत्र रूप विचार रखने वालों की बेचैनी बढ़ती जा रही है. किताबों से लेकर किसी भी माध्यम पर ओपन विचारों का फलक बचा हुआ नहीं दिख रहा है. अनुराग कश्यप इसके कोई पहले उदाहरण नहीं हैं. इसी देश में अनेक लेखकों-पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है. यह घटना पिछले कुछ सालों ज्यादा चिंताजनक हो गयी है.

किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी थाती वे असहमत विचार ही होते हैं, जिससे सत्ता की परेशानी बढ़ती है. फ्रेंच क्रांति पर गहरा प्रभाव डालने वाले वालतेयर की उक्ति लोकतंत्र की सबसे बड़ी चेतना का हिस्सा है कि मैं आप के विचारों से सहमत नहीं हूं लेकिन आपके विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता को बनाये रखने की गारंटी का हिमायती हूं.

भारत के लोकतंत्र की यही विशेषता रही है. दुनिया का आधुनिक लोकतंत्र फ्रांस की क्रांति से उभरे मूल्यों के इर्दगिर्द ही परवान चढ़ा है. भारत ने आजादी के बाद नेहरू के जमाने में वह दौर भी देखा है जब नेहरू ने चाणक्य के छद्म नाम से लेख लिखकर नेहरू को (यानी खुद को) तानाशह बनने से रोकने के लिए आलोचना किये जाने का आह्वान किया था.

उस दौर में जब संसद में विपक्ष नगण्य हैसियत में था, तब भी कुछ आवाजें थीं, जो सत्ता के खिलाफ मुखर थीं. और उनकी बातें गौर से सुनी जाती थीं. लोकतंत्र की यह विरासत आपातकाल में कमजोर हुई थी. लेकिन खत्म नहीं हो पायी थी. आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान छपने वाले तमाम भूमिगत पर्चे और पत्रिकाएं इसका उदाहरण हैं. उस दौर के इतिहास को जिस तरह विकृति के साथ पेश किया जा जा रहा है और उसे ही सच बताने का प्रयास किया जा रहा है. वर्तमान मर्ज के गंभीर लक्षण हैं. इसलिए विचारों का खामोश किया जाना उन्हें डराना लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर मामला है. लोकतंत्र को एकाधिकारवादी बना देना भी संविधान की विविधताओं के सम्मान की गांरंटी का उल्लंघन है. इसे उन्हीं लोगों को समझना जरूरी है जो ट्रोल करने में माहिर हैं और किसी भी तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

भारत में मीडिया पर जिस तरह कारपारेट और सत्ता का नियंत्रण हुआ है, उसका परिणाम यह है सूचनाएं और वास्तविक ग्राउंड सच्चाई, खबरों से गायब होती गयी हैं. इस का नतीजा है कि आर्थिक क्षेत्र का स्लो डाडन ओर उससे पैदा हुए संकट की खबरों को नियोजित तरीके से गायब कर दिया गया है. भारत के लोकतंत्र ने कभी इस तरह की मीडिया की कल्पना नहीं की थी. जो केवल सरकार के प्रोपगेंडा का ही वाहक बन कर रह जाये.  आलोचनाओं और सहमतियों को देशद्रोह साबित करने में मीडिया का बड़ा हिस्सा सारी सीमाओं का अतिक्रमण कर गया है.

संसदीय लोकतंत्र वाले किसी भी देश में मीडिया की हालत इतनी चिंताजनक कभी नहीं रही है.  मीडिया स्वतंत्रता के दुनिया के तमाम अध्ययनों में बताया गया है कि भारत का संविधान बेहद नीचे चला गया है. मीडिया की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक नजरिया किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है. सूचनाओं की स्वतंत्रता और हर एक तक उसकी उपलब्धता के बगैर निरंकुशता तो बची रह सकती है लेकिन लोकतंत्र नहीं.

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