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हर बुखार को वायरल बुखार कहकर बैठ जाना जिंदगी से खेलने के बराबर है

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Dr. S. Kumar

हर बुखार को वायरल बुखार कहकर बैठ जाना जिंदगी से खेलने के बराबर है
डॉ एस कुमार.

ह बहुत ही आम बात है कि किसी भी बुखार को डॉक्टर द्वारा वायरल बुखार बता दिया जाता है और बिना जांच के एंटीबायोटिक दवा लेने की सलाह दे दी जाती है. यदि यह वायरल बुखार ही है, तो फिर एंटीबायोटिक की क्या जरूरत है? वायरल बुखार इन्फेक्शन एंटीबायोटिक से ठीक नहीं होता है. अधिकतर वायरल इन्फेक्शन अपनेआप ठीक हो जाता है, तो फिर डॉक्टर को एंटीबायोटिक की सलाह देने की क्या जरूरत पड़ गयी. इसका अर्थ यह हुआ कि डॉक्टर खुद कन्फर्म नहीं है कि वायरल बुखार ही है.

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मेरे हिसाब से हिन्दुस्तान में वायरल इन्फेक्शन कम होता है. यहां बैक्टीरियल इन्फेक्शन ज्यादा होता है. इसलिए, यदि बुखार 1020F से ज्यादा हो रहा है, तो कुछ जांच अवश्य  करवा लेनी चाहिए. सिम्टम्स और साइन के अनुसार जांच अवश्य होनी चाहिए. कॉमन जांचों में सीबीसी, टाइफॉयड, पेशाब, मलेरिया इत्यादि की जांच करानी चाहिए, ताकि बुखार के कारण का पता चल सके और सही तरीके से एंटीबायोटिक कोर्स देना चाहिए, ताकि जड़ से बुखार ठीक किया जा सके, साथ ही बार- बार बुखार आने से बचाया जा  सके. यह ध्यान रखें कि पांच से सात दिनों में कॉमन एंटीबायोटिक से टाइफॉयड, UTI (यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन) इत्यादि ठीक तो हो जाते हैं, पर जड़ से ठीक नहीं हो पते हैं और दो-तीन सप्ताह में पुनः बुखार आने लगता है. इसे रिलैप्स कहते हैं. यदि टाइफॉयड डायग्नोसिस होता है, तो कम से कम 10 से 14 दिनों के लिए उपुयक्त एंटीबायोटिक दवा लेनी चाहिए. यदि UTI  डायग्नोसिस हुआ है, तो कम से कम सात से 10 दिनों तक एंटीबायोटिक दवा लेनी चाहिए. पेशाब में मवाद (पस) काफी मिला है, तो 10 दिनों में एंटीबायोटिक लेने के बाद दोबारा पेशाब जांच करानी चाहिए, ताकि बचे हुऐ इन्फेक्शन को एंटीबायोटिक का कोर्स बढ़ाकर जड़ से ठीक हो जाये और बुखार दोबारा या दूसरे सिम्टम्स नहीं आयें. इसके बाबजूद UTI खत्म नहीं होता है, तो पांच से सात दिनों तक एंटीबायोटिक इंजेक्शन का कोर्स पूरा करना चाहिए.

उपरोक्त उदाहरण इसलिए लिखा गया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वायरल बुखार मानकर बैठ नहीं जाना चाहिए और उपयुक्त जांच जरूर करवा लेनी चाहिए, ताकि आनेवाली दिक्कतों को प्रिवेंट किया जा सके.

उदाहरण– 1

तीन साल के एक बच्चे को दो सालों तक वायरल बुखार कहकर एंटबायोटिक कोर्स चार से पांच दिनों तक पूरा करवाकर बुखार खत्म कर दिया जाता था और 15-20 दिनों में दोबारा बुखार आने पर पुनः वही एंटीबायोटिक कोर्स दे दिया जाता था. दो सालों तक यह सिलसिला चलता रहा और लाखों रुपये डॉकटर को दे दिये गये. एक आधी रात को उस डॉकटर के नहीं रहने के कारण बच्चे को मेरे पास लाया गया और मैंने उसी समय UTI बताकर उसका इलाज किया. जांच में UTI कन्फर्म होने के बाद US KUB और MCUG करवाया और फिमोसिस एवं VUR डायग्नोसिस हुआ, जो ऑपरेशन करके ठीक कर दिया गया. इसके बाद वह बच्चा बिल्कुल ठीक रहने लगा. यदि वायरल बुखार कहकर उसे दो-तीन सालों तक इसी तरह छोड़ दिया जाता, तो संभवतः उसकी किडनी परमानेंट खराब हो गयी होती और किडनी ट्रांसप्लांट की नौबत आ गयी होती.

उदाहरण- 2

अभी हाल ही में एक नौ साल के बच्चे को अक्सर बुखार आने पर टाइफॉयड की जांच करवाकर टाइफॉयड कन्फर्म करके वायरल फीवर की बात को मैंने डिस्प्रूव कर दिया और उसे उपयुक्त एंटीबायोटिक देकर हमेशा के लिए ठीक कर दिया गया. टाइफॉयड भी काफी लंबा होने पर कई कॉम्प्लीकेशंस होते हैं और स्थिति काफी भयावह हो सकती है. अतः इसकी जांच जरूरी है.

उदाहरण-3

एक 50 वर्ष की महिला का कई वर्षों तक ठीक से टाइफॉयड का इलाज नहीं होने पर उसे अंतड़ियों का कैंसर हो गया और ऑपरेशन करवाना पड़ा.

उदाहरण-4

एक 35 वर्ष की महिला के बुखार और गिरते वजन का ठीक से डायग्नोसिस नहीं हुआ और वायरल बुखार कहकर सालों तक अनुपयुक्त इलाज होता रहा. जब वह 50 से 35 किलो की हो गयी, तो वेल्लोर हॉस्पिटल जाकर SLE डायग्नोसिस करवाया और अंततः  उपयुक्त इलाज के बाद वह ठीक रहने लगी और इस तरह उसकी जान बच गयी.

उदाहरण-5

पांच महीने के एक बच्चे को कई दिनों से बुखार आ रहा था और निरंतर लिवर स्प्लीन बढ़ता जा रहा था. HB और Platelets भी कम होते जा रहे थे और किसी भी दवा/एंटीबायोटिक का बिल्कुल असर नहीं हो रहा था. वायरल बुखार मानकर बच्चे का कई  जगह इलाज भी हुआ, लेकिन हालत बिल्कुल गंभीर हो गयी और अंततः मैंने  HLH के लिए जांच करवायी, जो कन्फर्म हो गया. तब  जाकर  उपयुक्त इलाज किया गया और बच्चे की जान बच गयी.

अंततः वायरल बुखार कहकर बैठ नहीं जाना चाहिए, बल्कि उपयुक्त जांच कर पक्का इलाज करवाना चाहिए, ताकि जान बच सके और किसी भी अंग का नुकसान नहीं हो.

[नोट : लेखक शिशु रोग विशेषज्ञ { MBBS, MD, MRCPCH (London)} हैं.]

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