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रद्द की जा चुकी धारा 66-ए के तहत अब भी मुकदमे चलाए जा रहे हैं : शीर्ष अदालत हैरान

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New Delhi : उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि उसकी ओर से 2015 में ही रद्द की जा चुकी सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए के तहत अब भी लोगों पर मुकदमा चलाया जा रहा है. केंद्र से जवाब तलब करते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसा है तो अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को जेल भेज दिया जाएगा.

न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन और न्यायमूर्ति विनीत शरण की पीठ ने कहा, ‘‘यह चौंकाने वाली बात है कि लोगों पर अब भी एक ऐसे प्रावधान के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है जिसे यह अदालत 2015 में ही निरस्त कर चुकी है. यदि ऐसा है तो हम सभी संबंधित अधिकारियों को जेल भेज देंगे.’’

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न्यायालय ने केंद्र को नोटिस जारी कर चार हफ्ते के भीतर उससे जवाब मांगा. पीयूसीएल नाम के एनजीओ की तरफ से पेश हुए वकील संजय पारिख ने शुरू में कहा कि तीन साल पहले प्रावधान निरस्त कर दिए जाने के बावजूद मुकदमे चलाए जा रहे हैं. शरण ने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक धारा 66-ए निरस्त कर दिए जाने के बाद अब तक 22 से ज्यादा मुकदमे चलाए गए हैं.

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विचार एवं अभिव्यक्ति की आजादी को अहम बताते हुए शीर्ष अदालत ने 24 मार्च 2015 को सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए को निरस्त कर दिया था. अदालत ने कहा था कि धारा 66-ए जनता के जानने के अधिकार को सीधे तौर पर प्रभावित करता है.

धारा 66-ए में संशोधन के लिए कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने 2012 में पहली जनहित याचिका दायर की थी. महाराष्ट्र के ठाणे जिले के पालघर से शाहीन और रेनू की गिरफ्तारी के बाद श्रेया ने यह याचिका दायर की थी. शाहीन और रेनू ने शिवसेना नेता बाल ठाकरे के निधन के मद्देनजर मुंबई में बंद के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली थी.

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इस संबंध में अनेक शिकायतों के मद्देनजर शीर्ष अदालत ने 16 मई 2013 को एक परामर्श जारी कर कहा था कि सोशल मीडिया पर कथित तौर पर कुछ भी आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों की गिरफ्तारी पुलिस महानिरीक्षक या पुलिस उपायुक्त स्तर के वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति के बिना नहीं की जा सकती.

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