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खस्ताहाल इकोनॉमीः आंकड़ों की हकीकत से मुंह छिपाकर खुद को ही छलने की कोशिश कर रही है सरकार

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Faisal  Aurag

इकोनोमी के खास्ताहाल होने के बाद भी इसे ले कर केंद्र में बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिखायी पड़ रही है. केंद्र के कई मंत्री तो जिस तरह का तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं उसके संकेत यही हैं. मोदी सरकार ने इस संकट की गंभीरता को स्वीकार नहीं करने की नीति को अपना लिया है.

इकोनोमी से जुड़े हर मामले में मोदी सरकार की यही नीति रही है. नोटबंदी को भारी कामयाबी बताने वाली मोदी सरकार के उन पांच महीनों को याद कीजिये.  किस तरह उसकी कामयाबी का ढोल पीटा गया और बैंकों के नियम लगातर बदले गये.

जीएसटी को ले कर भी पहले कही गयी बातों में ओर बाद में लगातार जीएसटी रेट के बदलाव की कथा भी इससे अलग नहीं है. साफ है कि यह नीतियों का ही असर है जो लगातार ग्रोथ दर को कम कर रहा है. अब भी साफ नहीं है कि भारत की वास्तविक जीडीपी का आंकड़ा क्या है. सरकारी आंकड़े पांच प्रतिशत बता रहे हैं लेकिन अर्थशासित्रयों ने इसे भी चुनौती दी है.

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इस संदर्भ में डॉ मनमोहन सिंह ने वीडियो जारी कर हालात को बंहद गंभीर बताया है. मनमोहन सिंह के इस वीडियों के वायरल होते ही कानून मंत्री सामने आये और पूर्वोत्तर सरकारों को दोषारोपित करने के भाजना के अभियान के तहत ही डॉ सिंह की बातों का मजाक बनाने का प्रयास किय. वित मंत्री ने मनमोहन सिंह की बातों को खारिज तो नहीं किया लेकिन बेहद हल्के अंदाज में लेते हुए कहा कि वे इसे ले कर संजीदा हैं.

डॉ सिंह ने नोटबंदी के संदर्भ पर बोलते हुए कहा था कि यह भारतीय अर्थव्यस्था के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित होगी. और ये लूट और डकैती है. आमतौर पर डॉ सिंह कठोर बातें नहीं करते हैं. इसे गंभीरता से लेने के बजाय सरकार ने उनका मजाक बनाया. डॉ सिंह ने अपने उस भाषण में जीडीपी में कम से कम 2 प्रतिशत गिरावट की बात कही थी. उनकी बातें सच प्रमाणित हुई हैं और जीडीपी उनके अनुमान से कहीं ज्यादा ही गिरी है.

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डॉ सिंह ने कहा है कि भारत के पास तेज विकास दर हासिल करने की पूरी संभावना है. लेकिन यह पूरा संकट मानवनिर्मित यानी मैनमेड बलंडर है. उन्होंने यह भी कहा है कि यह पूरा संकट पिछले छह साल की आर्थिक नीतियों का ही दुष्परिणाम है.

प्रो अरुण कुमार तो इस पांच प्रतिशत की विकास दर को ही चुनौती दे रहे हैं. उन्होंने कहा है कि असंगठित क्षेत्र के आंकडों को दूर रखने के कारण विकास दर पांच प्रतिशत दिख रहा है.  असंगठित क्षेत्र के आंकडों को यदि इसमें जोड़ा जायेगा तो यह आंकड़ा शून्य प्रतिशत होगा.

उन्होंने कहा है कि देश का असंगठित क्षेत्र 94 प्रतिशत है. ओर इसके संकट को आर्थिक विमर्श से जोड़ा नहीं जा रहा है. असंगठित क्षेत्र तो बेहद बदहाल है. इसी तरह कुछ अन्य अर्थशास्त्री भी मान रहे हैं कि सरकार का फोकस वास्तविक हालात से उभरना नहीं है बल्कि यह साबित करना है कि सबकुछ ठीक है. स्वघोषित कुछ जानकार भी सरकार के साथ हैं. ओर सरकार का बचाव करते हुए हालात को सामान्य ही बता रहे हैं. वे उन आवाजों को सुनना नहीं चाह रहे हैं जो उन से सहमत नहीं हैं.

इस संकट का ही नतीजा है कि पोलिटिकल इकोनोमी की दुर्दशा हो रही है. राजनीतिक तौर पर वर्चस्व और वोट बटोरने वाली प्रक्रियाओं के कारण किसी बहस को खड़ा ही नहीं होने दिया जा रहा है. और इसके लिए पूरी सजगता दिखायी जा रही है.

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वाजपेयी शासन काल में हिंदू अर्थशास्त्र की बात करते हुए शाइनिंग इंडिया के गुब्बारे को उसकी नीतियों का ही नतीजा बताया गया था. मोदी सरकार ने अब तक इस तरह का कोई सूत्र नहीं दिया है. लेकिन देखा जा रहा है कि आर्थिक संकट की बहस को टालने के लिए हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं. दरअसल जब तक यह स्वीकार नहीं किया जायेगा कि आर्थिक संकट बेहद गंभीर है.

तब तक उससे निपटने के लिए साझा पहल भी नहीं दिखेगी. निर्मला सीतारमण ने पत्रकारों के सवालो का जवाब देते हुए एक बार जरूर संकट की हकीकत को टाला है. उन्होंने कहा है कि वे इंडस्ट्री से बातें कर रही हैं. जबकि हकीकत यह है कि केवल इंडस्ट्री इस संकट को  नहीं टाल सकती. क्योंकि इस संकट में उसकी भी एक भूमिका है जिसे देर-सबेर स्वीकार करना ही होगा. अर्जेटीना का संदर्भ देते हुए सीतारमण ने कहा है कि वहां की सरकार ने वहां के फेडेरल बैंक के प्रमुख को हटा कर जरूरी धन ले लिये थे.

यह कहते हुए उन्होंने इस हकीकत को नजरअंदाज कर दिया कि जब वहां की सरकार ने बैक से धन मांगा तो बैंक प्रमुख ने उसे देने से साफ मना कर दिया. मनाही के बाद उन्होंने इसके खतरों को ले कर कुछ तथ्य पेश किये. वहां की सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया. ओर बैंक प्रमुख को ही बर्खास्त कर दिया. बाद के अर्जेंटीना की हकीकत सबसके सामने है कि वही देश किस तरह लडखड़ा गया और अब भी उस संकट का सामना कर रहा है. यह वहीं अर्जेंटीना है कि ब्राजील और उरूग्वे के साथ आर्थिक विकास की नई कहानी 90 के दशक में गढ रहा था. और आज कंगाली का शिकार हैं. एशियन टाइगर आज कहां है.

उनकी हालत को भी देखी जानी चाहिए. एशियन टाइगर के रूप में उभरे देशों में सिंगापुर, इंडोनेशिया और आसपास के कई देश थे. सिंगापुर ने तो बेहद खराब हालत से उबरने में कई साल लिये. लेकिन एशियन टाइगरों की विकास गाथा अब एक त्रासदी के रूप में देखी जाती है.

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भारत को भी यह देखना चाहिये और विश्व के अतीत से सबक लेते हुए वास्तविक आंकड़ों की हकीकत को स्वीकार करना चाहिये. ताकि अंधेरे में कोई रोशनदान बनाया जा सके.

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