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आर्थिक मंदी की दस्तकः भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अगले पांच साल बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं

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Faisal Anurag

आर्थिक संकट के भयावह होते दौर में एक और बुरी खबर ने परेशानी बढ़ा दी है. खबर यह है कि महिंद्रा ने 1500 कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया है. महिंद्रा ऑटो इंडस्ट्री एक बड़ी कंपनी है. मारुति सुजुकी ने भी इसके पहले 3000 कर्मचारियों को को नौकरी से हटाया था. टाटा मोटर्स की हालत भी चिंताजनक बनी हुई है. देश की आर्थिक हालत पर कई बड़े उद्योगपतियों ने गहरी चिंता जतायी है. इस कड़ी में ताजा पहलू जाने-माने उद्योग टाइकून और इंनफोसिस के पूर्व प्रमुख मोहनदास पई ने ध्यानाकर्षण किया है.

नरेंद्र मोदी के समर्थकों में एक रहे पई का कथन व्यवसायियों के उस हालात को व्यक्त करता है, जिससे मेनस्ट्रीम मीडिया बेखबर दिखाई दे रहा है. पई ने द क्विींट से बातचीत करते हुए कहा है इंडस्ट्री अब और झटका बर्दाश्त करने की हालत में नहीं है. उन्होंने जोर दे कर कहा कि इंडस्ट्री को लगातार झटके दिये जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अभी नहीं जगे तो पछताना होगा. उन्होंने बताया है कि नोटबंदी और जीएसटी सहित आइएल एंड एफएस व एनबीएफसी के मुसीबत में पड़ने से हालात और गंभीर हुए हैं. उन्होंने यह कह कर चौंका दिया है कि बाजार में लिक्विीडिटी नहीं है. यानी बाजार में पैसा नहीं है तो कारोबार आखिर कैसे होगा. पई के अनुसार हालात अलार्मिग रेखा को पार गये हैं.

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पई ने इंडस्ट्री पर सरकार ओर एजेंसियों के बेजा दबाव का सवाल उठाकर एक ऐसा पहलू सामने रखा है जिसे गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है. उनके अनुसार आटो इंडस्ट्री बेहद बुरे दोर में है. उस पर और दबाव दिये जाने से हालात और भी पेचीदा होंगे. इसका दूसरा अर्थ यह है कि हालात और भी बदतर होने की राह पर हैं.

यह बात कहनेवाले वे देश के गिने चुने लोगों में एक बड़ा नाम हैं. आरिन कैंपिटल्स के चेयरमैन पई ने कहा कि इंडस्ट्री भी ई-वेकिल्स की समर्थक हैं, लेकिन इस पर जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिये. उन्होंने कहा कि इसके लिए इंडस्ट्री को विश्वास में लिया जाना चाहिये. और उन्हें इंसेंटिव देना चाहिये. सरकार की नीति के उलट पई ने यह बात कही है. इससे जाहिर होता है कि सरकार की नीतियों को लेकर इंडस्ट्री के भीतर एक खास तरह की परेशानी है. घुटन है. उसे ही पई ने स्वर दिया है.

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पई ने कहा है कि अभी इकोनोमी की हालत बेहद खराब है. नौकरी पैदा करने वाले रियल स्टेट और आटो सेक्टर बेहद गंभीर हाल में हैं. नीतियों के कारण ही 30 हजार इंडस्ट्री देश के बाहर चले गये हैं. इसका कारण भारी टैक्स है. उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत एक ऐसा देश है जो भारी फारेन आउटफलो की गिरफत में है.

अर्थात् पूंजी देश के बाहर भाग रही है. यह रिकार्ड स्तर पर है. जुलाई में ही केवल 200 करोड़ डालर बाजार से निकले हैं. यह कोई सामान्य बात नहीं है. यह भारत की अर्थ व्यवस्था की गंभीरता को ही प्रकट कर रहा है. पई कह रहे हैं कि यदि इस साल ग्रोथ कम रही तो आगे और मुश्किल होगी. उन्होंने कहा कि यदि हालात तुरंत नहीं सुधरे तो अगले पांच साल बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं.

ऐसा लगता है कि अर्थशास्त्रियों और अब उद्योगपतियों के रूख को सकार नजरअंदाज करने के मूड में है. भरोसा दिलाने से ज्यादा जरूरी यह हो गया है कि इकोनामी की हालत में सुधार लाने के लिए त्वरित कदम उठाये जायें. यह संकट 2008 के वैश्विक संकट से बहुत अलग है. हाल ही में कई जानकारों ने कहा है कि भारत में रोजगार संकट केवल सामयिक नहीं हैं. बल्कि वह ढांचागत हो गया है. और इसकी गंभीरता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है. जानकारों का कथन है कि 2008-09 के संकट से भारत बखूबी उबर गया था. लेकिन वर्तमान मंदी से उबरना आसान नहीं होगा. भारत के सार्वजनिक क्षेत्रों को जिस तरह नुकसान पहुंचाया गया है, उससे हालात और ज्यादा पेचीदा हो गये हैं.

दुनिया की अर्थ राजनीति में कई ऐसे पहलू उभरे हैं जो विकासशील और उभरती हुई इकोनोमी के लिए बेहद घातक हैं. अमरीका की नीतियों के कारण भी दुनिया के कई देशों में परेशानी का आलम है. अनेक देशों में जिस तरह फार राइट राजनीति (अति दक्षिणपंथी) का विस्तार हो रहा है, उससे इकोनामी ज्यादा प्रभावित हो रही है. जिन ताकतों ने स्वतंत्र विश्व बाजार का विचार इजाद किया था वे ही राष्ट्रवादी बाजार के लिए ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं. यूरोपियन यूनियन के बिखराव की दस्तक से इस संकट को क्या रूप मिलेगा. या क्या इसका क्या असर होगा, इस पर भी अर्थशास्त्री चिंतित है.

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डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का भी कई देशों पर नकारात्मक प्रभाव दिख रहा है. ई-अमरीका की इकोनोमी की स्थिरता और विस्तार भी कितनी वास्तविक साबित होगी, इसे ले कर भी अमरीका में भारी बहस हो रही है. भारत में यह संकट इन सभी देशों से बहुत अलग है. और इसे तत्काल संबोधित किये जाने की जरूरत है.

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