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उद्यमियों के सीधे चुनाव में उतरने के खतरनाक राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं  

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Faisal  Anurag

स्टैंडिंग कामेडियन कुणाल कमारा ने व्यंग्य करते हुए हाल में कहा था, हमारे और अंबानी के बीच मोदी जी क्या कर रहे हैं. दरअसल भारत की राजनीति में कारपोरेट के बढ़ते प्रभाव पर उनकी टिप्पणी यह बताती है कि हालात ऐसे ही बने रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उद्योग धंधे के लोग अपनी पार्टी बना कर चुनाव मैदान में सीधे आयेंगे.

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झारखंड विधानसभा चुनाव में कारोबारियों की संस्था चेंबर ऑफ कामर्स ने अपने प्रत्याशी खड़े किये हैं. उसके दो निहितार्थ हैं. पहला तो यह कि उद्यमी सरकारों के नजरिये और पहल से बेहद नाराज हैं. वे राजनीति में सीधे प्रवेश कर यह साबित कर रहे हैं कि वे केवल राजनीतिक दलों के मददगार ही नहीं बने रहना चाहते, बल्कि राजनीति को ही नियंत्रित करना चाहते हैं.

दूसरा निहितार्थ तो और भी खतरनाक है. वह बताना चाहते हैं कि वर्तमान राजनीतिक दलों की साख खत्म हो चुकी है. वे केवल वोटर ही नहीं बने रहना चाहते बल्कि वोट ले कर निर्णय की प्रक्रिया के हिस्सेदार भी बनना चाहते हैं.

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भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उद्यमियों की भूमिका शुरू से ही रही है. लेकिन राजनीतिक फैसलों को वे परोक्ष तरीकों से ही प्रभावित करते रहे हैं. लकिन बदले हालात में वे अपने हितों की रक्षा करने के लिए बेचैन हैं. यह सामान्य राजनीतिक परिघटना नहीं है. भारत में राजनीति और कारपोरेट के अंतरसंबंधों की को ले कर पहले से ही अनेक अंदेशे रहे है.

अधिकांश राजनीतिक दलों की आर्थिक नीतियों पर कारपोरेट हितों के वर्चस्व को देखा जा सकता है. यह विवाद उठता रहा है कि बजट को प्रभावित करने में विभिन्न कारपोरेट समूह अपने प्रभावों का इस्तेमाल करते रहे हैं. खास कर 1980 के बाद की भारतीय राजनीति पर कारपोरेट का बढता प्रभाव पिछले कुछ सालों में तो बेहद गंभीर हो गया है.

आजाद भारत में स्वतंत्र पाटी जहां बड़े पूंजीपतियों के हितो की वकालत के लिए जानी जाती रही है, वहीं जनसंघ को मंझोले और छोटे व्यवसायियों की समर्थक पार्टी माना जाता रहा है. वह दौर मिश्रित अर्थव्यवस्था का था जिसे ले कर इन दोलो दलों के मुखर विरोध थे. बावजूद इसके उद्यामियों के सीधे प्रभाव से बचा जाता रहा.

लोकसभा ओर राज्यसभा में कभी-कभार कोई पूंजीपति जरूरी आ गया. लेकिन वह किसी न किसी पार्टी की मदद से ही. लेकिन भारत की रराजनीति में क्रोनी कैपिटल के प्रभाव ने राजनीति के पूरे चरित्र को ही बदल दिया है. वैश्विक बदलावों के असर के बीच भारत की राजनीति अमेरीका की तरह बदलने लगी.

अमेरीका में पूंजीपतियों के राष्ट्रपति बनने के कई उदाहरण हैं. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की परिघटना इसमें भी एक माइलस्टोन है. ट्रंप ने लोकतंत्र की मान्यताओं को चुनौती देते हुए धनशक्ति का जिस तरह इस्तेमाल किया है, उससे भारत की राजनीति भी प्रभावित होने लगी है.

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ऐसे माहौल में चेंबर ऑफ कामर्स के चुनाव लड़ने के निर्णय से जाहिर होता है कि भारत की राजनीति में उद्यमियों की दखल का यह एक आगाज है. भारत के पास माल्या का उदाहरण भी है, जो राजनीतिक दलों  की मदद ले कर राज्यसभा में पहुंच गया.

और फिर न केवल धन की लूट की बल्कि इसे अपने संसदीय प्रभाव का इस्तेमाल करने का बेशर्म उदाहरण बनाकर पेश किया. कारपोरेट ने दखल दे कर लोकतंत्र की अहम संस्थाओं पर जिस तरह नियंत्रण करने का प्रयास किया है, उसके खतरनाक परिणाम दुनिया के अनेक देशों ने देखा है.

मीडिया की पूरी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को विवादों में डाल कर कारपोरेट अपने हितों के समक्ष सरकारों को बाध्य करने के प्रयास करता रहता है. किसानों, गरीबों और मजदूरों के साथ वंचित समूहों के हितों के लिए भारत की प्रतिबद्धता इन प्रक्रियाओं से बाधित होती ही है.

दूसरी ओर, अवसरपरस्त और विचारहीन दलबदल की घटनाओं के कारण लोकतंत्र की साख जहां कमजोर हुई है वहीं दूसरी ओर सरकारों के कामकाज के तरीकों से बढ़ी नाराजगी ने अराजक माहौल का सृजन भी किया है. चुनावों में सीधे भागीदरी की घटना इसका शुरूआती रुझान है.

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