न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

मुस्लिम समाज- तीन तलाक कानून से पहले बने मॉब लिंचिंग के खिलाफ कानून

1,359

Dr Mahfooz  Alam

देश के प्रधानमंत्री का अल्पसंख्यकों को डर से बाहर निकालने का आश्वासन खोखला साबित हो रहा है और लोकतंत्र पर भीड़ तंत्र हावी होती जा रही है. अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिमों के साथ भीड़ की हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है. 18 जून 2019 को झारखंड के खरसावां में कथित चोरी के आरोप में पकड़ाये तबरेज अंसारी को बुरी तरह पीटा गया. उसका नाम पूछकर उसे जय श्रीराम और जय हनुमान का नारा लगवाया गया.

JMM

इस पिटायी के बाद 21 जून को उसकी मौत हो गयी. 20 जून 2019 को दिल्ली के अमन विहार में एक मदरसा शिक्षक  मौलाना मोहम्मद मोमिन को भी जय श्रीराम का नारा नहीं लगाने पर बुरी तरह  मारापीटा गया. इसी प्रकार 22 जून को अगरतला में भारत-बांग्लादेश की सीमा पर एक 22 वर्षीय कॉलेज छात्र शरीफ मियां का शव गोलियों से छलनी मिला, जिसे बीएसएफ के जवानों ने गौ तस्करी के संदेह में गोली मार दी थी. शरीफ के पिता बाबुल मियां का कहना है कि दो बजे रात में दो बीएसएफ नौजवान उसे घर से उठा कर ले गये.

इसे भी पढ़ेंः  मुस्लिम समाज- आतंकवाद, राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता के नाम पर डराने की राजनीति पर चल रही है भाजपा

ये घटनाएं इस ओर इंगित कर रही हैं कि देश भीड़तंत्र की ओर जा रहा है और एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं नई हैं बल्कि विगत 5 वर्ष में कई मासूम और बेगुनाह भीड़ की हिंसा का शिकार बन चुके हैं. यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा, यह कहना मुश्किल है.

दुनिया देख रही है कि देश में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है. अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट के यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम रिपोर्ट 2018 में कहा गया है कि भारत में  गौ हत्या एवं धर्म परिवर्तन के नाम पर मुस्लिम, दलित और ईसाई के विरूद्ध हिंसा बढ़ती जा रही है. इस हिंसा के खिलाफ की गयी कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किये गये हैं.

इसे भी पढ़ेंः आखिर कितने बच्चों की मौत के बाद जागेगी समाज और व्यवस्था की संवेदना

अगर तीन तलाक पर सरकार को कानून बनाने की इतनी जल्दबाजी है तो फिर भीड़ की हिंसा पर कानून बनाने में इतनी कोताही क्यों. हालांकि तीन तलाक पर जो कानून बनाया जा रहा है वह न तो मुस्लिम महिलाओं के हित में है और न ही मुस्लिम समाज के हित में. इस कानून से समस्या के निराकरण के बदले समस्या को और अधिक जटिल बनाया जा रहा है. ऐसे कानून बनाने से पहले मुस्लिम महिलाओं और मुस्लिम समाज से सुझाव लेना चाहिए था.

बहरहाल, इधर कुछ वर्षों से भीड़ की हिंसा में मारे गये लोगों की घटनाओं  से महिलाएं भी कम प्रभावित नहीं हुई हैं.  यदि मुस्लिम महिलाओं से इतनी हमदर्दी है तो भीड़ की हिंसा पर भी कानून बनना चाहिए. लेकिन तीन तलाक के बहाने जो संदेश दिया जा रहा है, उसे मुसलमानों का एक बड़ा तबका अपने लिए खतरनाक मानता है.

मुस्लिम विद्वानों के एक बड़े ग्रुप का मानना है कि तीन तलाक के बहाने धीरे-धीरे मुस्लिम पर्सनल ला को समाप्त कर दिया जायेगा, जो संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन होगा.

यदि सरकार को अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिमों के उत्थान और तरक्की की वाकई फिक्र है तो उनके  जानमाल की सुरक्षा भी होनी चाहिये. और इस पर तीन तलाक कानून के पहले ही विचार होना चाहिए. यह सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए.

सरकार को ऐसे कड़े प्रावधान एवं कानून बनाने चाहिए ताकि भीड़ की हिंसा पर तुरंत काबू पाया जा सके न कि ऐसे लोगों की रिहाई पर इन्हें माला पहनाकर और मिठाई बांटकर जश्न मनाया जाये. जैसा कि पूर्व मंत्री जयंत सिन्हा कर चुके हैं.

इसे भी पढ़ेंः मुस्लिम समाज- आतंकवाद, राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता के नाम पर डराने की राजनीति पर चल रही है भाजपा

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like