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सिर्फ वोटर बन कर रह गये हैं बोकारो स्टील प्लांट के उत्तरी क्षेत्र में बसे विस्थापित गांव के ग्रामीण

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Prakash Mishra

Bokaro :  बोकारो स्टील प्लांट के उत्तरी क्षेत्र में बसे विस्थापित गांवों में रहने वाले ग्रामीण सिर्फ वोटर बन कर रह गये हैं. इनकी जमीन पर बोकारो स्टील प्लांट बना, हर गांव से उन दिनों लोगों को प्लांट में नौकरी मिली, लेकिन गांव का जो विकास होना था, वह 50 वर्षों के बाद भी नहीं हो सका है. करीब 50 हजार आबादीवाले इस इलाके के लोग सांसद और विधायक को वोट देते रहें हैं, लेकिन इनकी रोजमर्रा की समस्या को लेकर धनबाद लोक सभा क्षेत्र से चुने जानेवाले किसी भी सांसद ने दूर करने की दिशा में ठोस पहल नहीं की. जिस कारण यह पूरा इलाका उपेक्षित है. हाल के वर्षों में कुछेक गांवों में पक्की सड़क नजर आने लगी है, लेकिन न तो स्वास्थ्य केंद्र और न ही बच्चों के पढ़ने के लिए कोई ढंग का स्कूल है. अब भी कई ऐसे परिवार हैं, जिनके पास राशन कार्ड तक नहीं है. कई बजुर्ग और विधवा महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा पेंशन तक नसीब नहीं हो सका है.

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यहां के लोगों का कहना है कि बोकारो स्टील प्लांट बनने के बाद इस इलाके की समृद्धि खत्म सी हो गई. न तो पंचायत में रहा और न ही शहर बन सका. प्लांट के लिए पूरे इलाके का अधिग्रहण हो गया और जिन्हें बोकारो स्टील प्लांट में नौकरी मिली, उनकी स्थिति में सुधार हुआ. अब तो गिने चुने लोगों की नौकरी बची है. जिन्हें नौकरी नहीं मिली, वे दिहाड़ी मजदूर बन कर रह गये. इसके साथ ही खेती और किसानी से भी इनका नाता टूटता चला गया. अब ऐसी स्थिति हो गई है कि अगर उस इलाके में किसानों की खोज की जाये, तो एक-दो अलावे किसान भी नहीं मिलेंगे.

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ठेका मजदूर के रूप में युवाओं को मिलता है काम

उत्तरी क्षेत्र में बसे विस्थापित गांवों के युवाओं को अब काम की तलाश में या तो देश के दूसरे महानगरों की ओर जाना पड़ रहा है या फिर बोकारो स्टील प्लांट में ठेका मजदूर बन कर काम कर रहे हैं. पचैरा गांव के रहनेवाले इंद्र केवट ने बताया कि सर्वे किया जाये तो इन इलाके के 19 छोटे-बड़े गांवों से सैकड़ों युवा बेंगलुरु, मुंबई में जाकर मजदूरी का काम करते हैं, जो बाहर नहीं जाना चाहते हैं, वे किसी तरह प्लांट के ठेकेदार से मिल कर प्लांट के अंदर काम करते हैं. उन्हें भी 20 दिन या 25 दिन ही काम मिल पाता है. जिसके बाद उन्हें बैठा दिया जाता है. प्लांट में जॉब के अनुसार ही ठेका मजदूरों का रखा जाता है. जबकि इतने बड़े स्टील प्लांट में युवाओं को नियोजन मिल जाने से रोजगार की समस्या दूर हो जाती. जबकि रोजगार को लेकर खेती तो पिछले 20 वर्षों से लोग छोड़ ही चुके हैं.

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गर्मी में धूल से परेशान रहते हैं ग्रामीण

उत्तरी क्षेत्र में बसे विस्थापित गांव शिबूटांड़, कुंडौरी, पचैरा, आगरडीह, बैद्यमारा, महुआर, बास्तेजी, धनघरी, महेशपूर, पिपराटांड, कनफट्टा, बेलडीह, कैलूडीह, जमुनियाटांड, बारुगढ़, करमाटांड, चैताटांड, मोदीडीह, कंचनपूर, मधुडीह गांव के लोग गर्मी के दिनों में बोकारो स्टील प्लांट के ऐश पौंड से उड़नेवाली छाई से काफी परेशान रहते हैं. जब कभी जोरदार आंधी चलती है, तो ऐश पौंड की छाई इन गांवों में प्रवेश कर जाती है. जिसके बाद गांव में रहना दूभर हो जाता है.

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मनरेगा सहित कई योजनाओं का नहीं मिलता लाभ

इस इलाके में मनरेगा के तहत किसी भी प्रकार की कोई योजना नहीं चलती है, क्योंकि यह इलाका पंचायत में शामिल नहीं है. इसके साथ ही सरकार की स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर घर में शौचालय की योजना का लाभ भी इलाके के ग्रामीणों को नहीं मिल सका है. सरकारी योजना के नाम पर सिर्फ सरकारी विद्यालय, इतनी बड़ी आबादी में काफी कम लोगों को राशन कार्ड ही मिल सका है. वहीं कुछ लोगों को गैस के कनेक्शन मिले हैं.

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पेयजल की भी नहीं है सुविधा

वर्षों पूर्व इस इलाके में परिक्षेत्रीय विकास योजना के तहत बोकारो स्टील प्लांट की ओर से हर गांवों में चापानल लगाने का काम हुआ था. उन चापानलों पर ही इलाके की पूरी आबादी पानी के लिए निर्भर है, जबकि कुंआ का पानी पीने लायक नहीं है. अब तो चापानल खराब हो जाने पर कोई उसे बनाने नहीं आता है, ऐसे में ग्रामीण खुद से खुद से चंदा कर चापानल बनवाते हैं. जबकि इस इलाके में बोकारो स्टील प्लांट की ओर से पानी भंडारण के लिए डैम बनाया गया है. वहां से पानी की आपूर्ति की जा सकती थी, लेकिन इस इलाके में ऐसी कोई व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी.

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