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कश्मीर मामलाः अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विवाद पैदा कर आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं?

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Faisal  Anurag

कश्मीर के मामले में अमरीका की मध्यस्थता के मामले में भारत में राजनीतिक विवादों के बीच संसद में विदेश मंत्री जयशंकर ने बयान दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप से इस तरह का कोई आग्रह नहीं किया है. ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ वार्ता के समय कहा ‘‘ दो सप्ताह पहले मैं प्रधानमंत्री मोदी से जब बात कर रहा था, तो उन्होंने कहा कि क्या आप मध्यस्थता कर सकते हैं. तब मोदी ने कहा, कश्मीर मामले में. ‘‘ इमरान खान ने बातचीत करते हुए ट्रंप से भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ्ता की बात की थी.

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इमरान खान ने कहा था कि उपमहाद्वीप के करोड़ों लोगों की शांति और सुरक्षा के सवाल पर कश्मीर का सवाल खड़ा रहता है. यदि ट्रंप मध्यस्थता करें तो उपमाद्वीप के विवाद ही खत्म हो जायेंगे. और इसके लिए अरबों लोग कृतज्ञ रहेंगे. पाकिसतान कश्मीर के सवाल को लंबे समय से एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय मामला बनाने की दिशा में कोशिश करता रहा है. भारत की नीति अब तक यह रही है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. और भारत पाकिस्तान के बीच किसी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की भूमिका को वह पूरी शिद्दत से नकारता रहा है.

इमरान खान ने तो पाकिस्तान की उस नीति के अनुसार ही ट्रंप से बातचीत में मध्यस्थ्ता का सवाल उठाया. लेकिन यहां अचरज यह है कि उनकी इस बात पर ट्रंप ने मोदी का हवाला क्यों दिया. भारत सरकार और  विदेशी मंत्री के बयान के बाद भी यह मामला शायद ही थमे. भारत की विदेश नीति में अनेक नये रुझानों की  चर्चा पिछले कुछ सालों से होती रही है. पिछले दो दशकों से भारत की विदेश नीति में अमरीका का महत्व बढ़ा है.

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भारत अमरीका परमाणु संधि को दोनों देशों की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा गया था. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने जापान, अमरीका इजराइल की धुरी बनाने की कोशिश की है. हालांकि भारत और अमरीका के बीच बीजा ओर व्यापार के सवाल को ले कर अनेक अंतरविरोध भी दिखे हैं. बावजूद भारत अमरीका के करीब आया है.

मोदी सरकार ने विदेश नीति के सवाल पर कोई नया डॉक्ट्राइन तो जारी नहीं किया है, लेकिन उसके रुझानों में बदलाव के साफ संकेत दिखते हैं. भारत चीन और रूस के साथ भी अपने संबंधों को ले कर सजग है. लेकिन इरान प्रततिबंध को लेकर भारत की नीति की जबरदसत आलोचना हुई है. भारत की विदेश नीति पर प्रवासी भारतीयों का असर पहले से कही ज्यादा दिखता है.

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ट्रंप के बयान को लेकर विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी से अपनी बातचीत का पूरा हवाला देने की मांग की है. विपक्ष का यह भी आरोप है कि इस तरह की पहल भारत की कश्मीर नीति के विपरीत है. भारत कश्मीर के सवाल पर अब तक किसी भी विदेशी के दखल को नकाराता रहा है. मोदी सरकार की कश्मीर नीति की अस्पष्टता के कारण भी इस सवाल पर विवाद होता रहा है.

मोदी सरकार के कुछ मंत्री जहां कश्मीर में पूरी सख्ती की बात करते हैं वहीं राजनाथ सिंह बार-बार वार्ता की वकालत करते रहे हैं. कश्मीर में पीडीपी के साथ भाजपा के प्रयोग जिस तरह विफल किये गये हैं उसका संदेश भी अच्छा नहीं गया है. लोकसभ में तो गृहमंत्री शाह यहां तक कह चुके हैं कि कश्मीर का सवाल नेहरू की ही देन है और कश्मीर में हुए चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रहे हैं. पकिस्तान तो लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि भारत के कश्मीर में जो चुनाव होते हैं वे वहां के लोगों की राय नहीं हैं. बल्कि उसके नतीजे भारत ही पहले तय कर देता है. शाह की बातें कई अर्थों में गलत भी नहीं हैं. लेकिन कश्मीर के वर्तमान हालात में जब वहां विधानसभा भंग है और चुनाव को बार-बार टाला जाता जा रहा है, इस तरह का बयान उन ताकतों के लिए अहम हो जाता है जो कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र मानते रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर कड़ा प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा है कि ये विवाद जानबूझकर पैदा किया गया है. उन्होंने कहा कि शायद ट्रंप समझ नहीं रहे हैं कि उन्होंने क्या कह दिया है. उन्हें अपनी इस बात की गंभीरता का अंदाज ही नहीं है. उन्हें इस तरह का बयान देने के पहले इसकी गंभीरता का अंदाज होना चाहिए और भारत के रूख के बारे में जानकार होना चाहिए.

भारत सरकार की प्रतिक्रिया के बाद अमरीकी विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले की गंभीरता को कम करने का प्रयास शुरू किया है. लेकिन ट्रंप के बयान से जाहिर है कि वह भारत के मामले में दखल देने के अवसर की तलाश में हैं. भारत की संप्रभू विदेश नीति को प्रभावित करने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं किया जा सकता है. पाकिस्तान को भी इस मामले पर अब नया रुख अपनाने की जरूर है. क्योंकि बदलते वक्त ने अनेक नीतियों को अप्रसांगिक बना दिया है. कश्मीर के सवाल को अंतरराष्ट्रीय करने की बात को भारत स्वीकार नहीं कर सकता है. महाशक्तियों को भी इस बात को समझना चाहिए.

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