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व्हाट्सएप जासूसी प्रकरण : भारत और इजरायल की सरकारों की भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता

WhatsApp espionage case The role of the governments of India and Israel cannot be dismissed

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Faisal Anurag

आखिर किसके हित में है जासूसी. व्हाट्सएप जासूसी प्रकरण के बाद भारत सहित उन तमाम देशों में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है जहां के पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और राजनेताओं की जासूसी की गयी है. अमरीका की एक अदालत में जब व्हाट्सएप ने जासूसी के बारे में जानकारी दी तो सारी दुनिया चौंक गयी.

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इसके पहले भी कैंम्बिज एनालिटिका का नाम जासूसी के मामले में आया था. कैंम्ब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के माध्यम से भारत सहित कई देशों के पत्रकारों और राजनेताओं की जासूसी की थी. खास कर चुनाव के ठीक पहले.

इन दोनों जासूसी के रहस्योद्घाटन ने सोशल मीडिया और साइबर जासूसी के अंदेशों से दुनिया भर में हलचल मचा दिया है. लोकतंत्र ओर नागरिकों की प्राइवेसी के अधिकार पर इसे हमला माना जा रहा है.

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व्हाट्सएप ने अमरीकी अदालत को सूचना दी है कि उसके सुरक्षित माने जाने वाले माध्यम से एक इजरायली कंपनी के स्स्पाइवेयर से दुनिया भर के चार हजार से ज्यादा पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनेताओं की निगरानी की और जासूसी की गयी. इसमें भारत के भी चार सौ लोग हैं.

भारत के पत्रकारों और मानवाधिकाकर कार्यकर्ता, जिस तरह निशाने पर रहे हैं वह बेहद चिंताजनक मामला है. व्हाट्सएप ने तो साफ कह दिया है कि स्पाइवेयर पेगासस सरकारों को ही बेचा जाता है. और उसका इस्तेमाल भी सरकार की एजेंसियां ही कर सकती हैं.

मामला प्रकाश में आने के बाद भारत सरकार ने स्पाइवेयर मामले की जांच के बजाय व्हाट्सएप से ही अपनी स्थिति चार दिनों में स्पष्ट करने को कहा है. स्पाइवेयर पेगासस की खरीद का मामला बेहद गंभीर है. सवाल केवल सरकार तक उसकी पहुंच का नहीं है.

बल्कि एक इजरायली कंपनी का जुड़ाव और संदर्भ भी बेहद संगीन है. दुनिया भर में इजरायल की भूमिका और उसके राजनीतिक मकसद को लेकर विवाद होते रहे हैं. पिछले अनेक सालों में भारत और इजरायल की मित्रता भी विवाद से परे नहीं है.

इजरायल न केवल मध्य एशिया में वर्चस्व के लिए उतावला है बल्कि वह भारत को अपना सहयोगी बनाने के लिए बेताब है. अरब के अनेक विवादों से घिरे इजरायल को लकर लोकतंत्रवादियों के अपने सवाल हैं.

इजरायली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जिस तरह व्हाट्सएप में सेंध लगाने के लिए किया गया है, उसे लेकर अनेक सवाल उठाये जा रहे हैं. यदि व्हाट्सएप के इस आरोप को सच मान लिया जाये कि स्पाइवेयर पेगासस की पहुंच केवल सरकाररों तक ही है, तो इस पूरे जासूसी प्रकरण में सरकारों की भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता है.

हालांकि सरकारें बेहद सावधानी से अपना बचाव कर रही है. व्हाट्सएप का नियंत्रण फेसबुक के पास है. और अमरीकी अदलत में फेसबुक भी इस मामले में पक्षकार है. हालांकि अब भी इस विवाद में अनेक सहस्य हैं. जिनका स्पष्ट होना अभी बाकी और जरूरी है.

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भारत सरकार ने कैम्ब्रिज एनालिटिका जासूरी मामले में भी फेसबुक से वैसा जवाब तलब किया था जैसा अब वह व्हाट्सएप से कर रही है. कैम्ब्रिज एनालिटिका मामले में तो यूरापियन कानून के तहत फाइन भी लगा था. लेकिन सीबीआई इस मामले में आंकड़ों की समीक्षा करने से आगे नहीं जा सकी है. जबकि वह मामला भी बेहद गंभीर था.

कैम्ब्रिज एनालिटिका भी एक कंपनी है. जिसने भारत सहित कई देशों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और बाधित करने का प्रयास किया था. भारत में इसने कई नेताओं और पत्रकारों की जासूसी की थी. इस संदर्भ में भी भारत में यह उजागर नहीं होने दिया गया कि कैंम्ब्रिज का इस्तेमाल आखिर किसके हित में किया गया था.

और उसे संचालित करने के लिए किस ने आर्थिक मदद की थी. उस विवाद में भारत सरकार पर भी संदेह प्रकट किया गया था. जांच की प्रक्रिया की सुस्ती भी रहस्य को और भी गंभीर बना देती है.

जिस तरह व्हाट्सएप को हैक किया गया है, उसके बाद से यह चिंता गंभीर होने लगी है कि आखिर व्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित क्यों किया जा रहा है. इसकी क्या जरूरत है. जब कि निजता के अधिकार को ले कर दो साल पहले ही भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्ट फैसला दिया था.

संविधान पीठ के उस फैसले ने भारत के संविधान और लोकतंत्र में निजता के अधिकार को बेहद महत्वपूर्ण बताया था. और संविधान की मूल आत्मा के रूप में उसे एक बड़ा तत्व बताया था. भारत में व्यक्ति की स्वतंत्रता ओर उसकी प्राइवेसी के अधिकार को सरकारों से अनेक बार चुनौती मिलती रही है.

लेकिन लोकतंत्र के आंदोलनों ने इसकी हिफाजत के लिए सजगता दिखायी है. दुनिया भर के लोकतंत्र का बुनियादी तत्व व्यक्ति की स्वतंत्रता ही तामाझामा है. व्यक्ति और अभिव्यकित की स्वतंत्रता के खिलाफ की गयी कोई भी जासूसी प्रक्रिया भारत के संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ है.

अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि व्हाट्सएप के माध्यम से कितने लोगों के जासूसी की गयी है. एक बयान में कंपनी ने स्वीकार किया है कि 100 से अधिक ऐसे मामले अब तक पहचान में आ चुके है. इसका दायरा भी लगातार बढता ही जा रहा है.

तकनीक की सुरक्षासंबंधी दावों के इस तरह हैक होने के बाद कई तरह के सवाल उठे हैं. तकनीक को असुरक्षित बनाने वालों की पहचान बेहद जरूरी है. ताकि लोकतंत्र और व्यक्ति की स्वतंत्रता की हिफाजत की जा सके.

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