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देश के आर्थिक हालात को लेकर विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज करने की प्रवृति हमें कहां ले जायेगी

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Faisal Anurag

आर्थिकी को लेकर विशेषज्ञ लगातार गंभीर चिंता प्रकट कर रहे हैं. बावजूद इसके न्यू इंडिया में इस सवाल पर किसी हरकत का नहीं होना किस मानसिकता को प्रकट कर रहा है. पीएमसी बैंक के उपभेक्ता लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं.

और उनके घरों में तबाही का आलम है. उसके दो उपभोक्ताओं की मौत तनाव के कारण हार्टअटैक से हो गयी. यह एक स्याह भविष्य का इशारा है. बावजूद इसके चुनाव के शोर में मुंबई की इस घटना को गंभीरता से नहीं लिया गया है.

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संजय गुलाटी जेट एयरवेज के कर्मचारी थे. जेट के बंद होने के बाद से वे बेरोजगार हैं. इस बैंक में उनके 90 लाख रुपये जमा हैं. लेकिन वे रुपयों के लिए मोहताज हो गये हैं. वे पीएमसी बैक की एक शाखा के सामने प्रदर्शन के लिए गये थे. वापस आने के बाद उन्हें हार्ट अटैक हुआ और अस्पताल पहुंचने के पहले ही मृत्यु हो गयी.

उनकी पत्नी और पिता कह रहे हैं कि बैंक डूबने के बाद से वे तनाव में थे. और उनका तनाव बढ़ता ही जा रहा था. बैंक ने ही उनकी असमय जान ले ली. इसी तरह की एक फत्तूलाल पंजाबी की भी मौत हार्ट अटैक के कारण हो गयी. उनका खाता भी इसी बैंक में था.

इसके बाद मुम्बई में पीएमसी बैंक की एक और खाताधारक ने आत्महत्या कर ली है. इस महिला का नाम निवेदिता बिजलानी है. निवेदिता (39) मुम्बई के अंधेरी इलाके में रहती थी. 13 अक्टूबर की रात निवेदिता ने नींद की गोलियों का ओवर डोज ले लिया था जिसकी वजह से उनकी मौत हो गयी. इस बैंक के 17 लाख से ज्यादा ग्राहक इसी तरह के तनाव से ग्रस्त हैं. उनकी इस असामान्य हालत से अन्य हिस्सें के लोगों की चुप्पी भी उन्हें कमजोर बना रही है.

सरकारों ने तो पीएमसी घोटाले के मामले में एक तरह से यह कहते हुए हाथ खींच लिया है कि रिजर्व बैंक उसे देख रहा है. केंद्र सरकार और महाराष्ट् सरकार भी जानती है कि बैंक के हालात किस तरह खराब हुए हैं. हाल तक जिस पीएमसी को कारपोरेटिब बैंको में सबसे ज्यादा मजबूत माना जा रहा था, उसमें दूसरे बैंको के विलय की प्रक्रिया तेज की गयी थी.

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वह अचानक डूब-सा गया. यह घटना तो एक दिन में हुई नहीं है. पिछले कुछ समय से बैंको के बारे में जिस तरह की खबरें आ रही हैं, वे बेहद चिंजाजनक हैं. लेकिन सरकार यह बताने में लगी हुई है कि आल इज वेल.

इस आल इज वेल के खिलाफ आर्थिकी के विशेषज्ञ पिछले डेढ सालों से चिंता प्रकट कर रहे हैं. पिछले कुछ महीनों से तो हर जानकार कह रहा है कि भारत की आर्थिक दिशा ठीक नहीं है. इस साल के नोबेल प्राइज  विजेता अभिजीत बनर्जी ने तो बेहद कड़ी बातें इस संदर्भ में की हैं. वे कह रहे हैं भारत सरकार के पास इकोनॉमी को ले कर कोई रोडमैप ही नहीं है.

मोदी सरकार के फैसलों पर भी टिप्पणी करते हुए उसे घातक बताया है. केवल बनर्जी ही नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रह्मण्यम लगातार कह कह रहे हैं कि भारत एक खतराक आर्थिक मोड़ पर है.

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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर की बातों को  मोदी सरकार को नजरअंदाज करने की आदत हो गयी हे. इस से हालात नहीं सुधरेंगे. प्रो अर्मत्य सेन 2014 से ही मोदी सरकार के आर्थिक नजरिये की आलोचना करते रहे हैं. इसके अलावे अब भारत की इंडस्ट्री की चिंता भी प्रकट होने लगी है. अनेक ऐसे पूंजीपति हैं जो अब आपस में खुल कर यह चर्चा करने लगे हैं कि इस हालात को बदलना जरूरी है. कहा तो यह भी जा रहा है कि भारत में औद्योगिक ग्रोथ लगातार घट रहा है.  और अब आंकड़े भी बता रहे हैं कि प्रवृति निगेटिव हो गयी है. कृषि क्षेत्र हो या कोर सेक्टर, सबमें तबाही दिखने लगी है.

भारत की जडीपी को लेकर दुनिया भर की संस्थाओं ने जिस गति से ग्रोथ अनुमान को घटाया है उसका वेश्विक प्रभाव भी निगेटिव होने का अंदेशा है. अब विश्व बैंक ने अपने अनुमानों में संशोधन करते हुए पांच प्रतिशत से कम ग्रोथ की बात का उल्लेख किया है.

मूडीज जैसी कई रंटिंग एजेसियों ने भी अनुमान को घटाया है. रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने भी अपने अनुमान को घटाया है. विश्व बैंक ने भारत के ग्रोथ्र रेट में उेढ प्रतिशत से अधिक गिरावट का अनुमान दर्ज किया है. यह सब मोदी के हाउडी दौरे के बाद ही हुआ है. जहां उन्होंने भारत की  आर्थिक प्रगति के चंगा होने की बात जोर-शोर से की थी.

भारत का कई देशों के साथ व्यापार संतुलन बेहद प्रभावित हुआ है. वास्तविकता तो यह है कि बांग्ला देश भी कई सेक्टर में भारत को पीछे छोड़ते हुए उससे आगे बढ गया है. बांग्ला देश जहां एशिया का नया आर्थिक टाइगर माना जा रहा है, वहीं भारत की इकोनॉमी के पांच ट्रिलियन होने के दावे को अब विश्व संदेह के निगाह से देख रहा है.

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हाल में आयी हंगर इंडेक्स के 112  देशो की सूची में भारत 102वें स्थान पर पहुच गया है. भारत के तामाम पडोसी देश उससे उपर हैं. बेहद बुरे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे पाकिसतान ने भी इसमें अपने हालात को सुधारा है. मोदी के सत्ता में आने के अगले ही साल 2015 में जारी इंडेक्स में भारत 55वें स्थान पर था.

2016 में वह 97वें स्थान पर पहुंच गया. पिछले दो सालों से वह 201 बनाम 102 स्थान की जंग कर रहा है. दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे देशों में भारत का पहुंचना बेहद शर्मनाक है. भारत की इकोनॉमी पर ठोस कदम उठाये बगैर हालात नहीं बदल सकते हैं.

यहां तक कि निर्मला सीतरामण के पति ने भी द हिंदू से कहा है कि केंद्र सरकार को डॉ मनमोहन सिंह की आर्थिक राह को अपना लेना चाहिए. एक तरह से उन्होंने भी इस सरकार के आर्थिक दिशाहीनता की ओर ही इशारा किया है.

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(डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचना, तथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं है. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.)

 

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