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आखिर भाकपा माओवादी पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाकर ग्रामीणों को क्यों पीट रहे हैं

 माओवादियो के सीधे निशाने पर केवल और केवल पुलिस मुखबिर हैं और शायद इसके लिए माओवादियों ने कथित पुलिस मुखबिरों की सूची बना रखी है

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Latehar : लातेहार जिले में लंबे समय से चुप बैठे भाकपा माओवादी फिर से हरकत में आ गये है विगत एक माह के अंदर में भाकपा माओवादी के दस्ते ने दो घटनाओं को अंजाम दिया.  मगर घटनाएं लेवी की मांग को लेकर नहीं और न ही  पुलिस को निशाना बनाने के उद्देश्य से की गयी. घटना को माओवादियों  ने केवल पुलिस मुखबिरी का आरोप लगा कर की.  जिससे यह प्रतीत हुआ कि माओवादियो के सीधे निशाने पर केवल और केवल कथित पुलिस मुखबिर हैं और शायद इसके लिए माओवादियों ने कथित पुलिस मुखबिरों की सूची बना रखी है .

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पुलिस मुखबिर होने के आरोप में एक माह में दो हमले

माओवादी ने पहली घटना लातेहार जिला के छिपादोहर थाना क्षेत्र के नवारनागु ग्राम में की. नवारनागु ग्राम से करमडीह पुलिस पिकेट की दूरी मात्र पांच से सात किमी है.  माओवादियो के 25- 30 लोगों के हथियार बंद दस्ते ने छह जुलाई को घर पर धावा बोलकर सुदामा सिंह के एक ट्रैक्टर व एक सवारी गाड़ी को फूंक दिया. इस दौरान नक्सलियों ने सुदामा सिंह व उनके बड़े पुत्र विकास कुमार सिंह की लाठी-डंडे व राइफल के कुंदे से जमकर पिटाई भी कर दी.

दूसरी घटना को अंजाम माओवादियो ने 17 जुलाई को अंजाम दिया. घटना जिले के बाढेसार थाना क्षेत्र से एवं सीआरपीएफ व आईआरबी पिकेट से मात्र दो किमी दूरी पर घटी.  यहां माओवादियो ने रात मात्र  8.30 बजे में जम कर तांडव मचाया.  ट्रेक्टर मालिक अशोक साव एवं इसके दो बेटो की पिटाई पुलिस मुखबिर बोल कर ही की गयी.  इस हमले में भी 25- 30  नक्सली शामिल थे.  हमले के दौरान  नक्सलियों ने यहां भी आगजनी की.   नक्सलियों ने अशोक  के दो ट्रैक्टर,  एक 407 वाहन एवं एक मोटर साइकल को आग के हवाले किया.

क्या आर्थिक रूप से पुलिस मुखबिर को कमजोर करना चाहते हैं माओवादी?

लगातार हुए दो हमलों में माओवादियो ने पूर्व की तरह पुलिस मुखबिरी के आरोप में ग्रामीणों की हत्या नहीं की,  केवल उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया और मारपीट की. इन दो घटनाओं को छोड़ कर देखा जाये तो माओवादी ज्यादातर पुलिस मुखबिरी के शक में ग्रामीणों की हत्या करते रहे हैं. मगर अब वे शायद आर्थिक रूप से उन्हें कमजोर कर रहे हैं, ताकि उन्हें सबक मिल सके. क्योंकि  माओवादी द्वारक  यदि ग्रामीणों की हत्या होती थी तो परिवार को बढ़िया मुआवजा एवं सरकारी नौकरी मिल जाती थी,  जिससे परिवा फिर से सपन्न हो जाता था.

गुरिल्ला वारफेयर पुलिस के साथ होता है ग्रामीणों के साथ नहीं : डीआईजी पलामू

इस मामले में पलामू डीआईजी विपुल शुक्ला ने बताया कि माओवादी गरीब ग्रामीणों के बेवजह निशान बना रहे हैं.  गुरिल्ला वारफेयर उनका पुलिस के साथ होता है, ग्रामीणों के साथ नहीं.  कहा कि भोले भाले मेहनत करने वाले ग्रामीणों को मारना, उनको आर्थिक रूप से कमजोर करना माओवाद नहीं है . माओवादी की छवि पहले से ही ग्रामीणों में खराब है. अब और भी खराब होगी .

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