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63000 छात्रों का पैसा तो लौटा देंगे, मगर कौन लौटायेगा नौकरी की आस में लगे उनके 4 साल

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Surjit Singh

वर्ष 2015 में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) ने कुल 1150 पदों के लिए विज्ञापन निकला था. रजिस्ट्रेशन की तारीख 2 जुलाई 2016 तक थी. 6 अगस्त 2016 को एडमिट कार्ड बंटा. 2.36 लाख छात्रों ने फॉर्म भरा था. 27 नवंबर 2016 को मेन परीक्षा हुई. जिसका रिजल्ट 27 अप्रैल 2017 को निकला. 2 से 7 मई 2017 तक सर्टिफिकेट चेक किया गया.

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मामला हाई कोर्ट में चला गया. और अब सरकार कह रही है इस नियुक्ति प्रक्रिया में सिर्फ स्थानीय छात्रों को नियुक्त किया जायेगा. कुल 63000 छात्रों को इस नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर किया जायेगा.

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झारखंड सरकार 63,000 छात्रों से आवेदन शुल्क के रुप में वसूला गया, करीब 3.50 करोड़ रुपया वापस करेगी. हर छात्र को 600 रुपये लौटायेगी. यह राशि छात्रों से करीब 4 साल पहले वर्ष 2015 में ली गयी थी. जब उन्होंने दो दिन पहले झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) द्वारा विज्ञापन जारी करने पर संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा (जेएसएससी-सीजीएल) के लिए फॉर्म भरते समय जमा किये थे.

यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि 63,000 छात्रों का चार साल बर्बाद हो रहा है और सब तरफ चुप्पी है. राजनीतिक पार्टियां भी. क्योंकि सरकार ने ऐसे वक्त में फैसला लिया है, जब चुनाव सर पर है और सभी दलों को स्थानीय वोट की चिंता है. मेन स्ट्रीम मीडिया भी खामोश. छात्र भी चुप ही हैं.

दो दिन पहले रघुवर दास की सरकार ने फैसला लिया है कि थर्ड ग्रेड, फोर्थ ग्रेड और सभी तरह के नन गैजेटेड पोस्ट पर सिर्फ स्थानीय लोगों की ही नियुक्ति की जायेगी. इसका मतलब यह हुआ कि राज्य के बाहर के जिन छात्रों ने फार्म भरा, परीक्षा दी, अब उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी. सरकार का यह फैसला विज्ञापन जारी होने के चार साल बाद लिये गये.

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विधानसभा चुनाव में स्थानीय वोटरों को रिझाने के उद्देश्य से लिये गये इस फैसले को लेते वक्त सरकार ने उन 63,000 छात्रों (जिनमें अधिकांश बिहार के रहने वाले हैं या झारखंड में रह रहे हैं) के बारे में नहीं सोचा. जिनपर यह फैसला पहाड़ बनकर टूटा है.

वर्ष 2015 से लेकर अब तक चार साल गुजर गये. नौकरी की आस में. इस बीच मामला हाईकोर्ट में भी पहुंचा. अगर मामला बेरोक-टोक चलती रहती तो बहुत पहले नियुक्ति प्रक्रिया शुरु हो गयी होती.

कानून की नजर से देखा जाये तो सरकार का यह फैसला गलत है. क्योंकि नियुक्तियों के लिए विज्ञापन चार साल पहले निकला था. और सरकार ने बाहरी छात्रों को अयोग्य करने का फैसला अब लिया है.

जेएसएससी ने चार साल पहले प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के 122, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के 139, सहकारिता प्रसार पदाधिकारी के 116, सचिवालय सहाय के 104, अंचल निरीक्षक सह कानूनगो के 108, प्रखंड कृषि पदाधिकारी एवं समकक्ष के 194, सहायक अनुसंधान पदाधिकारी एवं समकक्ष के 08, पौधा संरक्षण निरीक्षक एवं समकक्ष के 20, सांख्यिकी सहायक एवं समकक्ष के 18, श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी के 34, वरीय अंकेक्षक के 110, उद्योग विस्तार पदाधिकारी के 48, मत्स्य प्रसार पर्यवेक्षक के 30 और भूतात्विक विश्लेषक के 29 पदों के लिए विज्ञापन निकाला था.

सरकार और जेएसएससी के लिए तो शर्मनाक स्थिति यह होनी चाहिए कि चार साल में नियुक्ति प्रक्रिया शुरु नहीं की गयी. अगर बाहरी छात्रों को मौका नहीं देना था, तो विज्ञापन में ही इसका जिक्र क्यों नहीं किया गया.

क्या इस तरह जिन 63,000 छात्रों को अब अयोग्य करार दिया गया है, यह उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है. और सबसे बड़ा सवाल यह है कि 63,000 छात्रों का चार साल, जो नौकरी के इंतजार में बीता, उसे कौन वापस करेगा. सरकार या जेएसएससी.

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